Friday, May 4, 2018

मजदूर वर्ग के महान नेता और शिक्षक कार्ल मार्क्स (5 मई 1818 - 14 मार्च 1883)

क्या आप उनलोगों में से हैं जो अन्याय, गैर-बराबरी और शोषण को खत्म होते देखना चाहते हैं?

अगर हां, तो आपके लिए आज का दिन यानी 5 मई बहुत ही ख़ास है. इस दिन कार्ल मार्क्स का जन्म हुआ था और आज उनका 200वां जन्मदिन है.

जिन्होंने 20वीं शताब्दी का इतिहास पढ़ा होगा, वो इस बात से सहमत होंगे कि मार्क्स की क्रांतिकारी राजनीति की विरासत मुश्किलों भरी रही है.

मार्क्स के चार विचार जो आज भी ज़िंदा हैं

समाज में एक मजबूत सोशल इंजीनियरिंग उनकी विचारों से ही प्रेरित मानी जाती है. साम्राज्यवाद, आज़ादी और सामूहिक हत्याओं से उनके सिद्धांत जुड़ने के बाद उन्हें विभाजनकारी चेहरे के रूप में देखा जाने लगा.

लेकिन कार्ल मार्क्स का एक दूसरा चेहरा भी है और वो है एक भावनात्मक इंसान का. दुनिया की बेहतरी में उनके विचारों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है.

1. वो बच्चों को स्कूल भेजना चाहते थे, न कि काम पर

कई लोगों इस वाक्य को एक बयान के तौर पर ले सकते हैं पर साल 1848 में, जब कार्ल मार्क्स कम्युनिस्ट घोषणापत्र लिख रहे थे, तब उन्होंने बाल श्रम का जिक्र किया था.

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संघ के साल 2016 में जारी आंकड़ों के मुताबिक आज भी दुनिया में दस में से एक बच्चा बाल श्रमिक है.

बहुत सारे बच्चे कारखाना को छोड़कर स्कूल जा रहे हैं तो यह कार्ल मार्क्स की ही देन है.

द ग्रेट इकोनॉमिस्ट की लेखिक लिंडा यूह कहती हैं, "मार्क्स के साल 1848 में जारी घोषणापत्र में बच्चों को निजी स्कूलों में मुफ़्त शिक्षा देना उनके दस बिंदुओं में से एक था. कारखानों में बाल श्रम पर रोक का भी जिक्र उनके घोषणा पत्र मे किया गया था."

2. वो चाहते थे कि आप अपनी ज़िंदगी के मालिक खुद हों

क्या आज आप दिन के 24 घंटे और सप्ताह के सात दिन काम करते हैं? काम के समय में लंच ब्रेक लेते हैं? एक उम्र के बाद आपको रिटायर होना और पेंशन उठाने का हक़ है?

अगर आपका जबाव हां में है तो आप कार्ल मार्क्स को धन्यवाद कह सकते हैं.

लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर माइक सैवेज कहते हैं, "पहले आपको ज़्यादा लंबे वक्त तक काम करने को कहा जाता था, आपका समय आपका नहीं होता था और आप अपने खुद की ज़िंदगी के लिए नहीं सोच पाते थे."

कार्ल मार्क्स ने लिखा था कि कैसे एक पूंजीवादी समाज में लोगों को जीने के लिए श्रम बेचना उसकी मजबूरी बना दिया जाएगा.

मार्क्स के अनुसार अधिकांश समय आपको आपकी मेहनत के हिसाब से पैसे नहीं दिए जाते थे और आपका शोषण किया जाता था.

मार्क्स चाहते थे कि हमारी ज़िंदगी पर हमारा खुद का अधिकार हो, हमारा जीना सबसे ऊपर हो. वो चाहते थे कि हम आज़ाद हो और हमारे अंदर सृजनात्मक क्षमता का विकास हो.

सैवेज कहते हैं, "असल में मार्क्स कहते हैं कि हमलोगों को वैसा जीवन जीना चाहिए जिसका मूल्यांकन काम से न हो. एक ऐसा जीवन जिसका मालिक हम खुद हो, जहां हम खुद यह तय कर सकें कि हमे कैसे जीना है. आज इसी सोच के साथ लोग जीना चाहते हैं."

3. वो चाहते थे कि हम अपने पसंद का काम करें

आपका काम आपको खुशी देता है जब आपको अपने मन का काम करने को मिलता है.

जो हम जीवन में चाहते हैं, या फिर तय करते हैं, उसमें रचनात्मक मौके मिले और हम उसका प्रदर्शन कर सके तो यह हमारे लिए अच्छा होता है.

लेकिन जब आप दुखी करने वाला काम करते हैं, जहां आपका मन नहीं लगता है तो आप निराश होते हैं.

ये शब्द किसी मोटिवेशनल गुरु के नहीं है बल्कि 19वीं शताब्दी के कार्ल मार्क्स ने कही थी.

साल 1844 में लिखी उनकी किताब में उन्होंने काम की संतुष्टि को इंसान की बेहतरी से जोड़कर देखा था. वो पहले शख़्स थे जिन्होंने इस तरह की बात पहली बार की थी.

उनका तर्क था कि हम अपना अधिकांश समय काम करने में खर्च करते हैं, इसलिए यह ज़रूरी है कि उस काम से हमें खुशी मिले.

4. वो चाहते थे कि हम भेदभाव का विरोध करें

अगर समाज में कोई व्यक्ति ग़लत है, अगर आप महसूस कर रहे हैं कि किसी के साथ अन्याय, भेदभाव या ग़लत हो रहा है, आप उसके ख़िलाफ़ विरोध करें. आप संगठित हों, आप प्रदर्शन करें और उस परिवर्तन को रोकने के लिए संघर्ष करें.

संगठित विरोध के कारण कई देशों की सामाजिक दशा बदली. रंग भेदभाव, समलैंगिकता और जाति आधारित भेदभाव के ख़िलाफ़ क़ानून बने.

लंदन में होने वाले मार्क्सवादी त्योहार के आयोजकों में से एक लुईस निलसन के अनुसार, "समाज को बदलने के लिए क्रांति की ज़रूरत होती है. हमलोग समाज की बेहतरी के लिए विरोध प्रदर्शन करते है. इस तरह आम लोगों ने आठ घंटे के काम करने का अधिकार पाया."

कार्ल मार्क्स की व्याख्या एक दार्शनिक के रूप में की जाती है, पर निलसन इससे असहमत दिखते हैं. वो कहते हैं, "जो कुछ भी उन्होंने लिखा और किया, वो एक दर्शन की तरह लगते हैं पर जब आप उनके जीवन और कामों को गौर से देखेंगे तो आप पाएंगे कि वो एक एक्टिविस्ट थे. उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय कामगार संघ की स्थापना की. वो गरीब लोगों के साथ हड़ताल में शामिल हुए."

निलसन कहते हैं, "महिलाओं ने वोट देने का अधिकार कैसे प्राप्त किया? यह संसद से नहीं दिया, बल्कि इसलिए प्राप्त किया क्योंकि वो संगठित हुए और प्रदर्शन किया. हमलोग को शनिवार और रविवार को छुट्टी कैसे नसीब हुई? इसलिए नसीब हुई क्योंकि सभी मजदूर संगठित हुए और हड़ताल पर गए."

5. उन्होंने सरकारों, बिजनेस घरानों और मीडिया के गठजोड़ पर नजर रखने को कहा

आपको कैसा लगेगा अगर सरकार और बड़े बिजनेस घराने सांठगांठ कर लें? क्या आप सुरक्षित महसूस करेंगे अगर गूगल चीन को आपकी सारी जानकारी दे दे?

कार्ल मार्क्स ने कुछ ऐसा ही महसूस किया था 19वीं शताब्दी में. हालांकि उस समय सोशल मीडिया नहीं था फिर भी वो पहले शख़्स थे जिन्होंने इस तरह के सांठगांठ की व्याख्या की थी.

ब्यूनस आर्यस यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर वैलेरिया वेघ वाइस कहते हैं, "उन्होंने उस समय सरकारों, बैंकों, व्यापारों और उपनिवेशीकरण के प्रमुख एजेंटों के बीच सांठगांठ का अध्ययन किया. वो उस समय से पीछे 15वीं शताब्दी तक पहुंचे."

वैलेरिया वेघ वाइस के मुताबिक उनका निष्कर्ष यह था कि अगर कोई प्रथा व्यापार के लिए फ़ायदेमंद थी, जैसे गुलामी प्रथा उपनिवेशीकरण के लिए अच्छी थी तो सरकार इसका समर्थन करती थी.

वो आगे कहते हैं, "कार्ल मार्क्स ने मीडिया की ताक़त महसूस की थी. लोगों की सोच प्रभावित करने के लिए यह एक बेहतर माध्यम था. इन दिनों हम फेक़ न्यूज़ की बात करते हैं, लेकिन कार्ल मार्क्स ने इन सब के बारे में पहले ही बता दिया था."

वैलेरिया वेघ वाइस कहते हैं, "मार्क्स उस समय प्रकाशित लेखों का अध्ययन करते थे. वो इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि गरीब लोगों के द्वारा किए गए अपराधों को ज्यादा जगह दी जाती थी. वहीं, राजनेताओं के अपराधों की ख़बर दबा दी जाती थी."


'हांथ से निकली लड़कियां'

ज़माना तुम्हें देखता है


कुछ विस्मय, कुछ घृणा तो कुछ भय से


इसलिए कि तुम वो नहीं जो तुमसे आशा की गयी थी


जो तुम्हें ज़माना बनाना चाहता था


तुमने उस से बग़ावत की और बन गयी


वो जो तुम बनना चाहती थी।


 

तुम्हें अच्छा कहा जाता अगर तुम


अपना सर ढंक के उसे झुका लेती


रिवाज़ों, संस्कारों की पाषाण मूर्ति के सामने;


अपने सपनों को देखने की ज़िम्मेदारी देती बुज़ुर्गों को


या उनके सपनों को अपनी ज़िम्मेदारी मानती


लेकिन तुमने ऐसा नहीं किया।


 

तुमसे आशा की गयी थी कि


तुम खानदान का सम्मान बनो


अपने आत्मसम्मान की कीमत पर;


तुम उड़ो तो ज़रूर लेकिन पतंग की तरह


जिसकी उड़ान सीमित, नियंत्रित होती है


लेकिन तुम उन आशाओं के विपरीत गयी।


 

तुमने चुना किसी की बेटी, बहु, प्रेमिका, माँ से ऊपर


खुद का अस्तीत्व बनाये रखना


जिस वजह से तुम पर लगे इल्ज़ाम


ग़ैर जिम्मेदार, स्वार्थी, कठोर होने के


मानो जुर्म हो खुद के लिए जीना तुम्हारा


लेकिन तुमने परवाह नहीं की उसकी।


 

तुमने नहीं माना कि किसी का भविष्य


तय करे तुम्हारा भी भविष्य


तुमने गला नहीं घोटा अपनी महत्वकांक्षाओं का


जैसे तुम्हारी माँ ने किया था शायद;


सब चाहते थे तुम में तुम्हारी माँ को देखना


लेकिन तुम तुम्हारी माँ जैसी नहीं बनी।


 

तुमने चुने रास्ते वो जो तुम्हारे लिये सही थे


तुमने किये वो फैसले जो तुम्हारे हक़ में थे


तुम्हें नहीं मानी वो किताबें जो कहती थी


कि तुम्हारा जीवन त्याग है, बलिदान है


तुमने हासिल करने की ठानी वो


जिसपे तुम्हारा हक़, जिसमे तुम्हारी मेहनत है।


 

तुम बन गयी बिगड़ी हुई लड़कियां


हाथ से निकली हुई लड़कियां


जिसकी परछाई से भी बचाती माँए अपनी बेटियों को


जिनके नाम की कहानियां सुनाई जाती है


भूतों की कहानियों जैसे छोटी बच्चियों को


और कहा जाता इन सी मत बनना।


 

लेकिन तुम्हारा शुक्रिया बिगड़ी हुई लड़कियों


इन सब के बावजूद ऐसी होने के लिए जैसी तुम हो


शुक्रिया देने के लिए अपनी कहानियां मुझे


जो मैं अपनी बच्चियों को सुनाऊंगा और कहूँगा


मैं नहीं कहता कि इन जैसी ही बनो तुम


        मैं चाहता हूं तुम इनसे सीखो बनना वो जो तुम बनना चाहती हो।


गले मिलना पूरी दुनिया में प्रेम का प्रतीक है पर भारत में अश्लीलता का


गले मिलना कोई बुरी बात नहीं है। ना जाने जीवन में ऐसे कितने मौके आते हैं जब आप किसी  इंसान को गले लगाते हैं। गले मिलना स्वभाव प्रदर्शन की एक उपयुक्त विधि है। यह तरीका दिखाता है कि आप उस व्यक्ति की परवाह करते हैं और हर अच्छे बुरे समय में उसका साथ देंगे। एक ये भाव ही तो होता है जो निकटता दर्शाता है। प्रेम और ममता की निशब्द अभिव्यक्ति आखिर गले लगाने से बेहतर और क्या हो सकती  है?

एक मां ममता की आसक्ति में अपने बच्चे को गले लगा लेती है, कई खुशी और गम के मौकों पर एक भाई अपनी बहन को तथा एक पति अपनी पत्नी को गले लगा लेते हैं। क्रिकेटर मैदान पर खुशी और एकता के प्रदर्शन के लिए एक दूसरे को गले लगा लेते हैं तो बॉलीवुड के बहुत सारे कार्यक्रमों के मंच पर कलाकार और निर्माता निर्देशक भी गले मिलते दिखाई देते हैं।

यहां तक कि हमारे देश के प्रधानमंत्री भी किसी विदेशी मेहमान के आने पर कई बार प्रोटोकोल तोड़कर गले लगाकर भारतीय सरज़मीं पर उनका स्वागत करते दिखाई देते हैं। यही नहीं स्वर्गीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को भी वर्षों पहले क्यूबा के राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो ने स्नेह से गले लगाया था। यह किसी को धन्यवाद देने के लिए किया जाता है जो खुशी प्रकट करता है। यह बहुत सारे संदेश देता है क्योंकि यह दिल की गहराई तक महसूस होता है।

लेकिन मुझे नहीं पता कोलकाता मेट्रो में सफर कर रहे कपल की गले मिलने की वजह से लोग क्यों उग्र हो गये। कहीं ऐसा तो नहीं कि कुछ लोग गले लगने को सिर्फ सेक्स से जोड़कर देखते हों और किसी ऐसे मोके पर ऐसी स्थिति का विरोध करने उतर आते हो?

गले लगने की वजह से ही पिछले साल तिरुअनंतपुरम के एक स्कूल में बारहवीं के दो स्टूडेंट्स निलंबित कर दिए गए थे लड़के ने किसी सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान लड़की की तारीफ करते हुए उसे गले लगा लिया था स्कूल प्रबंधन को उनका गले लगना नागवार गुज़रा था। इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि जहां गले मिलना पूरी दुनिया में प्रेम का प्रतीक है वहां भारत में इसे सेक्स का प्रतीक समझा जाता है।
दरअसल गले लगने को अभी भी हमारे यहां कई जगह बेशर्मी का प्रदर्शन समझा जाता है। कुछ लोग हैं जो अभी भी इसे खुले में उपयुक्त नहीं समझते, शायद हो सकता है वो कभी बिना सेक्स के गले मिले ही ना हो? इस घटना पर भी जैसा मैंने सुना है कि एक बुजुर्ग व्यक्ति ने विरोध शुरू किया था। देखते-देखते विरोधियों की संख्या बढ़ गयी और मामला कुटमकुटाई तक जा पहुंचा। पर क्या इसमें सारा देश और समाज शामिल है?

दरअसल हम मामले को ज़्यादा तूल न देकर इसे दूसरे तरीके से भी समझ सकते है। एक बुज़ुर्ग जो आज 70 से पचहतर वर्ष की उम्र का है, उसे प्रेम से गले मिलना सेक्स ही दिखाई देता है क्योंकि उसने कभी जीवन में प्रेम किया ही ना हो तो उसे प्रेम के आलिंगन और सेक्स के आलिंगन में कोई खास अंतर नहीं दिखाई देगा। शायद ये फासला है सोच का! और मेरे ख्याल से इस फासले को किसी आन्दोलन से नहीं बल्कि प्रेम से खत्म किया जा सकता है।

जिन लोगों को यह घटना अश्लील लगी मुझे नहीं पता उनकी नज़र में अश्लीलता की परिभाषा क्या है। किसी को मटकना अश्लील लगता है, किसी को खुलकर हंसना, किसी को नाचना, किसी को चुम्बन में अश्लीलता दिखाई देती है और किसी को कोलकाता मेट्रो की तरह गले मिलना। जो लोग सोच रहे हैं कि गले मिलना कितना भारतीय है और कितना विदेशी? तो ये हमारी संस्कृति का हिस्सा है, क्योंकि ईद हो या दीपावली, शादी हो या कोई दु:खद हादसा हम सब पहले से ही गले लगते- लगाते आये हैं। यदि किसी को यह बुरा लगता है तो इस मानसिकता की आज के भारत में कोई जगह नहीं हैं।
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