Wednesday, September 27, 2017

भगत सिंह की ज़िंदगी के वे आख़िरी 12 घंटे

लाहौर सेंट्रल जेल में 23 मार्च, 1931 की शुरुआत किसी और दिन की तरह ही हुई थी. फ़र्क सिर्फ़ इतना सा था कि सुबह-सुबह ज़ोर की आँधी आई थी.
लेकिन जेल के क़ैदियों को थोड़ा अजीब सा लगा जब चार बजे ही वॉर्डेन चरत सिंह ने उनसे आकर कहा कि वो अपनी-अपनी कोठरियों में चले जाएं. उन्होंने कारण नहीं बताया.
उनके मुंह से सिर्फ़ ये निकला कि आदेश ऊपर से है. अभी क़ैदी सोच ही रहे थे कि माजरा क्या है, जेल का नाई बरकत हर कमरे के सामने से फुसफुसाते हुए गुज़रा कि आज रात भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दी जाने वाली है.
उस क्षण की निश्चिंतता ने उनको झकझोर कर रख दिया. क़ैदियों ने बरकत से मनुहार की कि वो फांसी के बाद भगत सिंह की कोई भी चीज़ जैसे पेन, कंघा या घड़ी उन्हें लाकर दें ताकि वो अपने पोते-पोतियों को बता सकें कि कभी वो भी भगत सिंह के साथ जेल में बंद थे.
बरकत भगत सिंह की कोठरी में गया और वहाँ से उनका पेन और कंघा ले आया. सारे क़ैदियों में होड़ लग गई कि किसका उस पर अधिकार हो. आखिर में ड्रॉ निकाला गया.
लाहौर कॉन्सपिरेसी केस
अब सब क़ैदी चुप हो चले थे. उनकी निगाहें उनकी कोठरी से गुज़रने वाले रास्ते पर लगी हुई थी. भगत सिंह और उनके साथी फाँसी पर लटकाए जाने के लिए उसी रास्ते से गुज़रने वाले थे.
एक बार पहले जब भगत सिंह उसी रास्ते से ले जाए जा रहे थे तो पंजाब कांग्रेस के नेता भीमसेन सच्चर ने आवाज़ ऊँची कर उनसे पूछा था, "आप और आपके साथियों ने लाहौर कॉन्सपिरेसी केस में अपना बचाव क्यों नहीं किया."
भगत सिंह का जवाब था, "इन्कलाबियों को मरना ही होता है, क्योंकि उनके मरने से ही उनका अभियान मज़बूत होता है, अदालत में अपील से नहीं."
वॉर्डेन चरत सिंह भगत सिंह के ख़ैरख़्वाह थे और अपनी तरफ़ से जो कुछ बन पड़ता था उनके लिए करते थे. उनकी वजह से ही लाहौर की द्वारकादास लाइब्रेरी से भगत सिंह के लिए किताबें निकल कर जेल के अंदर आ पाती थीं.
जेल की कठिन ज़िंदगी
भगत सिंह को किताबें पढ़ने का इतना शौक था कि एक बार उन्होंने अपने स्कूल के साथी जयदेव कपूर को लिखा था कि वो उनके लिए कार्ल लीबनेख़ की 'मिलिट्रिज़म', लेनिन की 'लेफ़्ट विंग कम्युनिज़म' और अपटन सिनक्लेयर का उपन्यास 'द स्पाई' कुलबीर के ज़रिए भिजवा दें.
भगत सिंह जेल की कठिन ज़िंदगी के आदी हो चले थे. उनकी कोठरी नंबर 14 का फ़र्श पक्का नहीं था. उस पर घास उगी हुई थी. कोठरी में बस इतनी ही जगह थी कि उनका पाँच फिट, दस इंच का शरीर बमुश्किल उसमें लेट पाए.
भगत सिंह को फांसी दिए जाने से दो घंटे पहले उनके वकील प्राण नाथ मेहता उनसे मिलने पहुंचे. मेहता ने बाद में लिखा कि भगत सिंह अपनी छोटी सी कोठरी में पिंजड़े में बंद शेर की तरह चक्कर लगा रहे थे.
'इंक़लाब ज़िदाबाद!'
उन्होंने मुस्करा कर मेहता को स्वागत किया और पूछा कि आप मेरी किताब 'रिवॉल्युशनरी लेनिन' लाए या नहीं? जब मेहता ने उन्हे किताब दी तो वो उसे उसी समय पढ़ने लगे मानो उनके पास अब ज़्यादा समय न बचा हो.
मेहता ने उनसे पूछा कि क्या आप देश को कोई संदेश देना चाहेंगे? भगत सिंह ने किताब से अपना मुंह हटाए बग़ैर कहा, "सिर्फ़ दो संदेश... साम्राज्यवाद मुर्दाबाद और 'इंक़लाब ज़िदाबाद!"
इसके बाद भगत सिंह ने मेहता से कहा कि वो पंडित नेहरू और सुभाष बोस को मेरा धन्यवाद पहुंचा दें, जिन्होंने मेरे केस में गहरी रुचि ली थी. भगत सिंह से मिलने के बाद मेहता राजगुरु से मिलने उनकी कोठरी पहुंचे.
राजगुरु के अंतिम शब्द थे, "हम लोग जल्द मिलेंगे." सुखदेव ने मेहता को याद दिलाया कि वो उनकी मौत के बाद जेलर से वो कैरम बोर्ड ले लें जो उन्होंने उन्हें कुछ महीने पहले दिया था.
तीन क्रांतिकारी
मेहता के जाने के थोड़ी देर बाद जेल अधिकारियों ने तीनों क्रांतिकारियों को बता दिया कि उनको वक़्त से 12 घंटे पहले ही फांसी दी जा रही है. अगले दिन सुबह छह बजे की बजाय उन्हें उसी शाम सात बजे फांसी पर चढ़ा दिया जाएगा.
भगत सिंह मेहता द्वारा दी गई किताब के कुछ पन्ने ही पढ़ पाए थे. उनके मुंह से निकला, "क्या आप मुझे इस किताब का एक अध्याय भी ख़त्म नहीं करने देंगे?"
भगत सिंह ने जेल के मुस्लिम सफ़ाई कर्मचारी बेबे से अनुरोध किया था कि वो उनके लिए उनको फांसी दिए जाने से एक दिन पहले शाम को अपने घर से खाना लाएं.
लेकिन बेबे भगत सिंह की ये इच्छा पूरी नहीं कर सके, क्योंकि भगत सिंह को बारह घंटे पहले फांसी देने का फ़ैसला ले लिया गया और बेबे जेल के गेट के अंदर ही नहीं घुस पाया.
आज़ादी का गीत
थोड़ी देर बाद तीनों क्रांतिकारियों को फांसी की तैयारी के लिए उनकी कोठरियों से बाहर निकाला गया. भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने अपने हाथ जोड़े और अपना प्रिय आज़ादी गीत गाने लगे-
कभी वो दिन भी आएगा
कि जब आज़ाद हम होंगें
ये अपनी ही ज़मीं होगी
ये अपना आसमाँ होगा.
फिर इन तीनों का एक-एक करके वज़न लिया गया. सब के वज़न बढ़ गए थे. इन सबसे कहा गया कि अपना आखिरी स्नान करें. फिर उनको काले कपड़े पहनाए गए. लेकिन उनके चेहरे खुले रहने दिए गए.
चरत सिंह ने भगत सिंह के कान में फुसफुसा कर कहा कि वाहे गुरु को याद करो.
फांसी का तख़्ता
भगत सिंह बोले, "पूरी ज़िदगी मैंने ईश्वर को याद नहीं किया. असल में मैंने कई बार ग़रीबों के क्लेश के लिए ईश्वर को कोसा भी है. अगर मैं अब उनसे माफ़ी मांगू तो वो कहेंगे कि इससे बड़ा डरपोक कोई नहीं है. इसका अंत नज़दीक आ रहा है. इसलिए ये माफ़ी मांगने आया है."
जैसे ही जेल की घड़ी ने 6 बजाय, क़ैदियों ने दूर से आती कुछ पदचापें सुनीं. उनके साथ भारी बूटों के ज़मीन पर पड़ने की आवाज़े भी आ रही थीं. साथ में एक गाने का भी दबा स्वर सुनाई दे रहा था, "सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है..."
सभी को अचानक ज़ोर-ज़ोर से 'इंक़लाब ज़िंदाबाद' और 'हिंदुस्तान आज़ाद हो' के नारे सुनाई देने लगे. फांसी का तख़्ता पुराना था लेकिन फांसी देने वाला काफ़ी तंदुरुस्त. फांसी देने के लिए मसीह जल्लाद को लाहौर के पास शाहदरा से बुलवाया गया था.
भगत सिंह इन तीनों के बीच में खड़े थे. भगत सिंह अपनी माँ को दिया गया वो वचन पूरा करना चाहते थे कि वो फाँसी के तख़्ते से 'इंक़लाब ज़िदाबाद' का नारा लगाएंगे.
लाहौर सेंट्रल जेल
लाहौर ज़िला कांग्रेस के सचिव पिंडी दास सोंधी का घर लाहौर सेंट्रल जेल से बिल्कुल लगा हुआ था. भगत सिंह ने इतनी ज़ोर से 'इंकलाब ज़िंदाबाद' का नारा लगाया कि उनकी आवाज़ सोंधी के घर तक सुनाई दी.
उनकी आवाज़ सुनते ही जेल के दूसरे क़ैदी भी नारे लगाने लगे. तीनों युवा क्रांतिकारियों के गले में फांसी की रस्सी डाल दी गई. उनके हाथ और पैर बांध दिए गए. तभी जल्लाद ने पूछा, सबसे पहले कौन जाएगा?
सुखदेव ने सबसे पहले फांसी पर लटकने की हामी भरी. जल्लाद ने एक-एक कर रस्सी खींची और उनके पैरों के नीचे लगे तख़्तों को पैर मार कर हटा दिया. काफी देर तक उनके शव तख़्तों से लटकते रहे.
अंत में उन्हें नीचे उतारा गया और वहाँ मौजूद डॉक्टरों लेफ़्टिनेंट कर्नल जेजे नेल्सन और लेफ़्टिनेंट कर्नल एनएस सोधी ने उन्हें मृत घोषित किया.
अंतिम संस्कार
एक जेल अधिकारी पर इस फांसी का इतना असर हुआ कि जब उससे कहा गया कि वो मृतकों की पहचान करें तो उसने ऐसा करने से इनकार कर दिया. उसे उसी जगह पर निलंबित कर दिया गया. एक जूनियर अफ़सर ने ये काम अंजाम दिया.
पहले योजना थी कि इन सबका अंतिम संस्कार जेल के अंदर ही किया जाएगा, लेकिन फिर ये विचार त्यागना पड़ा जब अधिकारियों को आभास हुआ कि जेल से धुआँ उठते देख बाहर खड़ी भीड़ जेल पर हमला कर सकती है.
इसलिए जेल की पिछली दीवार तोड़ी गई. उसी रास्ते से एक ट्रक जेल के अंदर लाया गया और उस पर बहुत अपमानजनक तरीके से उन शवों को एक सामान की तरह डाल दिया गया.
पहले तय हुआ था कि उनका अंतिम संस्कार रावी के तट पर किया जाएगा, लेकिन रावी में पानी बहुत ही कम था, इसलिए सतलज के किनारे शवों को जलाने का फैसला लिया गया.
लाहौर में नोटिस
उनके पार्थिव शरीर को फ़िरोज़पुर के पास सतलज के किनारे लाया गया. तब तक रात के 10 बज चुके थे. इस बीच उप पुलिस अधीक्षक कसूर सुदर्शन सिंह कसूर गाँव से एक पुजारी जगदीश अचरज को बुला लाए.
अभी उनमें आग लगाई ही गई थी कि लोगों को इसके बारे में पता चल गया. जैसे ही ब्रितानी सैनिकों ने लोगों को अपनी तरफ़ आते देखा, वो शवों को वहीं छोड़ कर अपने वाहनों की तरफ़ भागे. सारी रात गाँव के लोगों ने उन शवों के चारों ओर पहरा दिया.
अगले दिन दोपहर के आसपास ज़िला मैजिस्ट्रेट के दस्तख़त के साथ लाहौर के कई इलाकों में नोटिस चिपकाए गए जिसमें बताया गया कि भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु का सतलज के किनारे हिंदू और सिख रीति से अंतिम संस्कार कर दिया गया.
इस ख़बर पर लोगों की कड़ी प्रतिक्रिया आई और लोगों ने कहा कि इनका अंतिम संस्कार करना तो दूर, उन्हें पूरी तरह जलाया भी नहीं गया. ज़िला मैजिस्ट्रेट ने इसका खंडन किया लेकिन किसी ने उस पर विश्वास नहीं किया.
भगत सिंह का परिवार
इस तीनों के सम्मान में तीन मील लंबा शोक जुलूस नीला गुंबद से शुरू हुआ. पुरुषों ने विरोधस्वरूप अपनी बाहों पर काली पट्टियाँ बांध रखी थीं और महिलाओं ने काली साड़ियाँ पहन रखी थीं.
लगभग सब लोगों के हाथ में काले झंडे थे. लाहौर के मॉल से गुज़रता हुआ जुलूस अनारकली बाज़ार के बीचोबीच रूका.
अचानक पूरी भीड़ में उस समय सन्नाटा छा गया जब घोषणा की गई कि भगत सिंह का परिवार तीनों शहीदों के बचे हुए अवशेषों के साथ फिरोज़पुर से वहाँ पहुंच गया है.
जैसे ही तीन फूलों से ढ़के ताबूतों में उनके शव वहाँ पहुंचे, भीड़ भावुक हो गई. लोग अपने आँसू नहीं रोक पाए.
ब्रिटिश साम्राज्य
वहीं पर एक मशहूर अख़बार के संपादक मौलाना ज़फ़र अली ने एक नज़्म पढ़ी जिसका लब्बोलुआब था, 'किस तरह इन शहीदों के अधजले शवों को खुले आसमान के नीचे ज़मीन पर छोड़ दिया गया.'
उधर, वॉर्डेन चरत सिंह सुस्त क़दमों से अपने कमरे में पहुंचे और फूट-फूट कर रोने लगे. अपने 30 साल के करियर में उन्होंने सैकड़ों फांसियां देखी थीं, लेकिन किसी ने मौत को इतनी बहादुरी से गले नहीं लगाया था जितना भगत सिंह और उनके दो कॉमरेडों ने.
किसी को इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि 16 साल बाद उनकी शहादत भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के अंत का एक कारण साबित होगी और भारत की ज़मीन से सभी ब्रिटिश सैनिक हमेशा के लिए चले जाएंगे.

(ये लेख मालविंदर सिंह वड़ाइच की किताब 'इटर्नल रेबल', चमनलाल की 'भगत सिंह डॉक्यूमेंट्स' और कुलदीप नैयर की किताब 'विदाउट फियर' में प्रकाशित सामाग्री पर आधारित है.)

शहीद भगत सिंह

“इतिहास में गूँजता एक नाम हैं भगत सिंह
शेर की दहाड़ सा जोश था जिसमे वे थे भगत सिंह 
छोटी सी उम्र में देश के लिए शहीद हुए जवान थे भगत सिंह
आज भी जो रोंगटे खड़े करदे ऐसे विचारो के धनी थे भगत सिंह”

Tuesday, September 26, 2017

हम लड़ेंगे साथी...

हम लड़ेंगे साथी, उदास मौसम के लिए
हम लड़ेंगे साथी, ग़ुलाम इच्छाओं के लिए

हम चुनेंगे साथी, ज़िन्दगी के टुकड़े
हथौड़ा अब भी चलता है, उदास निहाई पर
हल अब भी चलता हैं चीख़ती धरती पर
यह काम हमारा नहीं बनता है, प्रश्न नाचता है
प्रश्न के कन्धों पर चढ़कर
हम लड़ेंगे साथी

क़त्ल हुए जज़्बों की क़सम खाकर
बुझी हुई नज़रों की क़सम खाकर
हाथों पर पड़े घट्टों की क़सम खाकर
हम लड़ेंगे साथी

हम लड़ेंगे तब तक
जब तक वीरू बकरिहा
बकरियों का मूत पीता है
खिले हुए सरसों के फूल को
जब तक बोने वाले ख़ुद नहीं सूँघते
कि सूजी आँखों वाली
गाँव की अध्यापिका का पति जब तक
युद्ध से लौट नहीं आता

जब तक पुलिस के सिपाही
अपने भाइयों का गला घोंटने को मज़बूर हैं
कि दफ़्तरों के बाबू
जब तक लिखते हैं लहू से अक्षर

हम लड़ेंगे जब तक
दुनिया में लड़ने की ज़रूरत बाक़ी है
जब तक बन्दूक न हुई, तब तक तलवार होगी
जब तलवार न हुई, लड़ने की लगन होगी
लड़ने का ढंग न हुआ, लड़ने की ज़रूरत होगी

और हम लड़ेंगे साथी
हम लड़ेंगे
कि लड़े बग़ैर कुछ नहीं मिलता
हम लड़ेंगे
कि अब तक लड़े क्यों नहीं
हम लड़ेंगे
अपनी सज़ा कबूलने के लिए
लड़ते हुए जो मर गए
उनकी याद ज़िन्दा रखने के लिए
हम लड़ेंगे....

सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना


मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती
बैठे-बिठाए पकड़े जाना बुरा तो है
सहमी-सी चुप में जकड़े जाना बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता
कपट के शोर में सही होते हुए भी दब जाना बुरा तो है
जुगनुओं की लौ में पढ़ना
मुट्ठियां भींचकर बस वक्‍़त निकाल लेना बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता

सबसे ख़तरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना
तड़प का न होना
सब कुछ सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर आना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना
सबसे ख़तरनाक वो घड़ी होती है
आपकी कलाई पर चलती हुई भी जो
आपकी नज़र में रुकी होती है

सबसे ख़तरनाक वो आंख होती है
जिसकी नज़र दुनिया को मोहब्‍बत से चूमना भूल जाती है
और जो एक घटिया दोहराव के क्रम में खो जाती है
सबसे ख़तरनाक वो गीत होता है
जो मरसिए की तरह पढ़ा जाता है
आतंकित लोगों के दरवाज़ों पर
गुंडों की तरह अकड़ता है
सबसे ख़तरनाक वो चांद होता है
जो हर हत्‍याकांड के बाद
वीरान हुए आंगन में चढ़ता है
लेकिन आपकी आंखों में
मिर्चों की तरह नहीं पड़ता

सबसे ख़तरनाक वो दिशा होती है
जिसमें आत्‍मा का सूरज डूब जाए
और जिसकी मुर्दा धूप का कोई टुकड़ा
आपके जिस्‍म के पूरब में चुभ जाए

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती।

Sunday, September 24, 2017

धर्म एक धंधा है


हमें समझना चाहिऐ कि संसार की सभी धार्मिक संस्थाओं का उद्देश्य केवल मानवों को मूर्ख बनाकर, ना सिर्फ उनका शोषण करना बल्कि धर्म व ईश्वर के नाम पर अपनी अन्य राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक महत्वाक्षांओं की पूर्ति भी करना हैं| इसी लिए हर धर्म के ठेकेदार आपका Brain Wash करते हैं ताकि आप धर्म व ईश्वर के नाम पर होने वाले हर गलत काम को भी सही समझ कर चलो| इस प्रकार आपको पता ही नही चलता कि आप कब, धर्म व ईश्वर के नाम पर मानसिक व शारीरिक गुलाम बन चुके हैं|
धर्म व ईश्वर हर व्यक्ति का निजी मामला हैं लेकिन धर्म के ठेकेदार आपका brain wash करके, धर्म को एक सामाजिक मुद्दा बना देते हैं, इससे हर धर्म के ठेकेदार आपका राजनीतिक, आर्थिक, मानसिक व शारीरिक, आपका हर तरह से शोषण करते हैं और आप भी खुशी खुशी अपना शोषण होने देते हैं|
कई लोग तो अपने धर्म व ईश्वर के प्रति इतने कट्टर हो जाते हैं कि वो अपने धर्म व ईश्वर के नाम पर मरने और मारने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं और आज तो हर धर्म के ठेकेदार अपने अपने भक्तों को अधिक से अधिक कट्टरवादी बनाने में लगे हुऐ हैं और इसका दुष्परिणाम पूरी दुनिया भुगत रही हैं|
हिन्दु धर्म भी एक ऐसी ही संस्था हैं जिसका एकमात्र उद्देश्य लोगों को तरह तरह के अंधविश्वासों, मान्यताओं व परम्पराओं के जाल में उलझाकर, उनका शोषण करना हैं|
आप भारत के किसी भी कोने में चले जाइए, हर जगह आपको कोई ना कोई तीर्थस्थान जरूर मिलेगा और उस तीर्थ स्थान के बारे में आपको कोई ना कोई कहानी भी जरूर सुनने को मिलेगी| जैसे-- यहां शिव ने तपस्या की थी, यहां सीता की चूडियां गिरी थी, यहां कृष्ण ने स्नान किया था, यहां पांडवों ने पूजा की थी, यहां ब्रह्मा ने श्राप दिया था, वगैरह वगैरह| सभी देवस्थानों, तीर्थ स्थलों व मंदिरों की यही कहानी हैं|
देश में 12 ज्योतिर्लिंग हैं, चार धाम हैं, और 51 शक्तिपीठ हैं| इन 51 शक्तिपीठों के पीछे ये कथा बताई जाती हैं कि सती के मृतक शरीर के टुकडे भूमि पर गिरे थे, जहां जहां ये टुकडे गिरे वहां शक्तिपीठ की स्थापना हुई| हालांकि सारे टुकडे सिर्फ भारतीय उपमहाद्वीप में ही क्यों गिरे, ये भी सोचने वाली बात हैं| हिन्दु धर्म के बारे में ऐसी एक नही बल्कि हजारों बाते सोचने का विषय हैं पर लोगों की समझ पर आस्था का पर्दा पडा हुआ हैं, जिससे धर्म व देवी देवताओं के बारे में उनकी सोचने समझने की क्षमता बिलकुल ही क्षीण हो चुकी हैं| और यही हाल अन्य सभी धर्मों के लोगों का भी हैं|
दरअसल ये सभी मन्दिर, तीर्थस्थान, सरोवर, धाम वगैरह लोगों को लूटने की शालाएँ हैं| बहुत ही षडयंत्रकारी तरीके से इनका अस्तित्व निर्माण हुआ हैं|
राजा द्वारा जमीन दान में ले ली, या अपनी मर्जी से जहाँ की चाहे जमीन हडप ली, फिर उस पर दान द्वारा भव्य मन्दिर निर्माण करवा दिया, फिर मन्दिर के बारे में झूठा प्रचार करवा दिया, बस हो गया काम! चढावा चढने लगा, भक्त आने लगे और तोता रटत शुरू हो जाती हैं-- ईश्वर शक्तिमान हैं, वो सब देख रहा हैं! संसार तो एक माया हैं, धन दौलत सब यही रह जाना हैं, इस लिए दान करो, ज्यादा से ज्यादा दान करो| (पहले राजाओं के जरिये ये काम होते थे अब सरकार के जरिये ये काम हो रहे हैं)
तब लोग विभिन्न कारणों से दान देना शुरू कर देते हैं और ज्यादा से ज्यादा धन पत्थरों की मूर्तियों को अर्पित करने लगते हैं| अब पत्थर की मूर्ति धन का क्या करेगी, वो सारा धन तो भगवान के दलालों की जेब में ही जाता हैं|
इन मन्दिरों को सदियों से भारतीय समाज को लूट लूट कर भरा गया हैं| आज भी मन्दिरों में अपार धन सम्पत्ति इकट्ठा हैं| तिरूपति बालाजी में 11 टन से भी ज्यादा सोना रखा हुआ हैं| इस मन्दिर की गर्भगृह की दीवारों पर 1000 करोड का सोने का प्लास्टर चढाया गया हैं| साई मन्दिर में हर साल अरबों रूपया चढता हैं| अहमदाबाद के उमियां के मन्दिर में 28/05/09 को केवल 7 घण्टों में 5 करोड का चढावा चढ गया था|
मन्दिरों में इतनी धन सम्पत्ति इकट्ठा हों चुकी हैं कि एक बार में ही देश से गरीबी समाप्त की जा सकती हैं| यहां पर मैंने सभी मन्दिरों की डिटेल नही दी हैं, ये लिस्ट तो बहुत लम्बी हैं|
धर्म के नाम पर हर वर्ष हम अपनी महान नदियों को खोते जा रहे हैं| हर वर्ष मूर्ति विसर्जन व पूजा सामग्रियों के रूप में टनों कूडा कर्कट नदियों में डाला जा रहा हैं| निर्णय अब आपको करना हैं, हम तो केवल आपको जागरूक करने का काम कर सकते हैं|

Saturday, September 23, 2017

भारत के क़द से छोटा था सुषमा का भाषण

सुषमा स्वराज ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के भाषण के बाद संयुक्त राष्ट्र की महासभा में अपना भाषण दिया है. यह स्वाभाविक है कि उन्होंने पाकिस्तान की ओर से भारत पर लगाए गए आरोपों का जवाब दिया है.

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने अपना भाषण अंग्रेज़ी में दिया था लेकिन सुषमा स्वराज ने भाषण हिंदी में दिया है. इसके मायने ये हैं कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ये संदेश दे रहे थे कि मैं दुनिया से बात करने आया हूं जबकि सुषमा स्वराज ये संदेश दे रही थीं कि मैं भारतीयों से बात करने आई हूं, आप चाहें तो मेरी बात सुनें, चाहे न सुनें.

लेकिन अगर आप दोनों नेताओं के भाषणों को देखें तो ये गली मुहल्ले की बातचीत जैसी थी. ये लोगों को पसंद तो आ सकती है लेकिन इसमें गंभीरता नहीं थी.

राष्ट्रवादियों को पसंद तो आएंगी लेकिन

आज दुनिया में भारत का जो क़द है, सुषमा स्वराज का भाषण उस क़द का नहीं था.

पाकिस्तान की आलोचना करत हुए सुषमा स्वराज ने जो दो-तीन बातें कही हैं, जैसे भारत अब इंजीनियर और डॉक्टर बनाता है और पाकिस्तान आतंकवादी पैदा करता है, वो उनके समर्थकों या भारतीय राष्ट्रवादियों को तो पसंद आएंगी लेकिन ये बातें दुनिया में भारत की अब जो हैसियत है उसके हिसाब से नहीं हैं.
 भारत दुनिया की तीन बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, ब्रिक्स देशों का हिस्सा है और संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता लेने की कोशिश कर रहा है.

सुषमा स्वराज के भाषण में वैश्विक दृष्टिकोण नहीं था या ऐसी कोई बात नहीं थी जो भारत को एक विश्व नेता के तौर पर स्थापित करती हो.

भारत के जो राष्ट्रवादी लोग हैं ये भाषण उनको तो अच्छा लग सकता है लेकिन इससे अंतरराष्ट्रीय समुदाय पर कोई असर नहीं होगा.
अगर भारत अपनी ओर से कोई ऐसा कार्यक्रम या रणनीति पेश करता जो चरमपंथ या जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए हो तो ज़रूर भारत का क़द बढ़ता.
आज दुनिया में अमरीका का रुतबा कम हो रहा है. राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप जिस तरह अमरीका की साख ख़त्म कर रहे हैं उसकी वजह से वैश्विक नेतृत्व की जगह खाली हो रही है और भारत उस खाली जगह को भर सकता है.

वैश्विक नेतृत्व कर सकता है भारत

यदि भारत उस खाली हो रही जगह का फ़ायदा नहीं उठाएगा तो चीन से बहुत पीछे रह जाएगा.

इसे इस तरह समझा जा सकता है कि जब तक आप काउंटी क्रिकेट खेलते रहेंगे आपको अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में स्थान नहीं मिलेगा. भारत को अगर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी साख बनानी है तो पाकिस्तान के साथ उपमहाद्वीप की काउंटी क्रिकेट छोड़नी होगी.

अगर भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना क़द बढ़ाना चाहता है तो वह चीन, रूस, मध्य पूर्व, जलवायु परिवर्तन और वैश्विक आर्थिक असमानता जैसे वैश्विक मुद्दों पर ऐसा रवैया अख़्तियार करे, जैसा दूसरे देश चाहते हैं कि अमरीका, ब्रिटेन या जापान का हो.

ऐसा करने से भारत का क़द बढ़ेगा लेकिन अगर भारत हर अंतरराष्ट्रीय फोरम पर पाकिस्तान पर ही निशाना साधता रहेगा तो इसका भारत में घरेलू स्तर पर तो असर होगा लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को कोई फ़ायदा नहीं होगा.

BHU की छात्राओं पर लाठीचार्ज


बनारस हिन्‍दु विश्‍वविद्यालय में शांतिपूर्ण धरने पर बैठी छात्राओं पर संघी वीसी के इशारे पर बर्बर लाठीचार्ज हुआ है। छेड़छाड़ करने वाले लम्‍पटों पर कार्रवाई करने की बजाय पीड़ि‍त लड़कियों पर ही लाठीचार्ज करवाकर फासीवादियों ने बता दिया है कि उनकी पक्षधरता किसके साथ है। यूसीडीई और दिशा छात्र संगठन इस बर्बर लाठीचार्ज की कड़ी निन्‍दा करते है। हम इंसाफपसन्‍द नौजवानों से अपील करते हैं कि वो इसके खिलाफ आवाज बुलन्‍द करें। कभी छात्राओं पर, कभी बेरोजगारों पर, कभी संघर्षरत मजदूरों पर तो कभी किसानों पर, जो भी हक अधिकार की लड़ाई लड़ रहा है, संघी भेड़िये उस पर पुलिस फोर्स दौड़ा रहे हैं। अगर हम आज इसके खिलाफ सड़कों पर नहीं उतरेंगे तो कल हमारा भी नम्‍बर आयेगा और तब कोई बोलने के लिए नहीं बचेगा।
इसलिए सभी न्‍यायप्रिय नौजवानों, सामान्‍य नागरिकों से हमारा पूरजोर आग्रह है कि वो इस घटना के विरोध में पूरे देश में विरोध प्रदर्शन आयोजित करें और संघियों को बता दें कि छात्राओं पर लाठीचार्ज और दमन करवाकर वो उनकी आवाज नहीं कुचल सकते।
बीएचयू की छात्राओं का संघर्ष जिन्‍दाबाद
फासीवादी वीसी मुर्दाबाद
छात्र, नौजवान एकता जिन्‍दाबाद