Tuesday, November 14, 2017

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू

एक सपना था जो अधूरा रह गया,
एक गीत था जो गूँगा हो गया,
एक लौ थी जो अनन्त में विलीन हो गई,
सपना था एक ऐसे संसार का जो भय और भूख से रहित होगा,
एक गीत था एक ऐसे महाकाव्य का जिसमें गीता की गूँज और गुलाब की गंध थी,
लौ थी एक ऐसे दीपक की जो रात भर जलता रहा,
हर अँधेरे से लड़ता रहा और हमें रास्ता दिखाकर,
एक प्रभात में निर्वाण को प्राप्त हो गया।

मृत्यु ध्रुव है, शरीर नश्वर है।
कल कंचन की जिस काया को हम चंदन की चिता पर चढ़ा कर आए,
उसका नाश निश्चित था। लेकिन क्या यह ज़रूरी था कि मौत इतनी चोरी छिपे आती?
जब संगी-साथी सोए पड़े थे, जब पहरेदार बेखबर थे,
हमारे जीवन की एक अमूल्य निधि लुट गई। भारत माता आज शोकमग्ना है – उसका सबसे लाड़ला राजकुमार खो गया।
मानवता आज खिन्नमना है – उसका पुजारी सो गया।
शांति आज अशांत है – उसका रक्षक चला गया।
दलितों का सहारा छूट गया।
जन जन की आँख का तारा टूट गया।
यवनिका पात हो गया।
विश्व के रंगमंच का प्रमुख अभिनेता अपना अंतिम अभिनय दिखाकर अन्तर्ध्यान हो गया।
वह शांति के पुजारी,
किन्तु क्रान्ति के अग्रदूत थे; वे अहिंसा के उपासक थे,
किन्तु स्वाधीनता और सम्मान की रक्षा के लिए हर हथियार से लड़ने के हिमायती थे।
वे व्यक्तिगत स्वाधीनता के समर्थक थे किन्तु आर्थिक समानता लाने के लिए प्रतिबद्ध थे। उन्होंने समझौता करने में किसी से भय नहीं खाया,
किन्तु किसी से भयभीत होकर समझौता नहीं किया।
पाकिस्तान और चीन के प्रति उनकी नीति इसी अद्भुत सम्मिश्रण की प्रतीक थी।
उसमें उदारता भी थी, दृढ़ता भी थी।
यह दुर्भाग्य है कि इस उदारता को दुर्बलता समझा गया,
जबकि कुछ लोगों ने उनकी दृढ़ता को हठवादिता समझा।

चीनी आक्रमण के दिनों में जब हमारे पश्चिमी देश इस बात का प्रयत्न कर रहे थे कि हम कश्मीर के प्रश्न पर पाकिस्तान से कोई समझौता कर लें तब एक दिन मैंने उन्हें बड़ा क्रुद्ध पाया। जब उनसे कहा गया कि कश्मीर के प्रश्न पर समझौता नहीं होगा तो हमें दो मोर्चों पर लड़ना पड़ेगा तो बिगड़ गए और कहने लगे कि अगर आवश्यकता पड़ेगी तो हम दोनों मोर्चों पर लड़ेंगे। किसी दबाव में आकर वे बातचीत करने के खिलाफ थे।

जिस स्वतंत्रता के वे सेनानी और संरक्षक थे, आज वह स्वतंत्रता संकटापन्न है। सम्पूर्ण शक्ति के साथ हमें उसकी रक्षा करनी होगी। जिस राष्ट्रीय एकता और अखंडता के वे उन्नायक थे, आज वह भी विपदग्रस्त है। हर मूल्य चुका कर हमें उसे कायम रखना होगा। जिस भारतीय लोकतंत्र की उन्होंने स्थापना की, उसे सफल बनाया, आज उसके भविष्य के प्रति भी आशंकाएं प्रकट की जा रही हैं। हमें अपनी एकता से, अनुशासन से, आत्म-विश्वास से इस लोकतंत्र को सफल करके दिखाना है। नेता चला गया, अनुयायी रह गए। सूर्य अस्त हो गया, तारों की छाया में हमें अपना मार्ग ढूँढना है। यह एक महान परीक्षा का काल है। यदि हम सब अपने को समर्पित कर सकें एक ऐसे महान उद्देश्य के लिए जिसके अन्तर्गत भारत सशक्त हो, समर्थ और समृद्ध हो और स्वाभिमान के साथ विश्व शांति की चिरस्थापना में अपना योग दे सके तो हम उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करने में सफल होंगे। शायद तीन मूर्ति को उन जैसा व्यक्ति कभी भी अपने अस्तित्व से सार्थक नहीं करेगा। वह व्यक्तित्व, वह ज़िंदादिली, विरोधी को भी साथ ले कर चलने की वह भावना, वह सज्जनता, वह महानता शायद निकट भविष्य में देखने को नहीं मिलेगी। मतभेद होते हुए भी उनके महान आदर्शों के प्रति, उनकी प्रामाणिकता के प्रति, उनकी देशभक्ति के प्रति, और उनके अटूट साहस के प्रति हमारे हृदय में आदर के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।

इन्हीं शब्दों के साथ मैं उस महान आत्मा के प्रति अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ।

Friday, November 10, 2017

नोटबन्दी के चार उद्देश्य

नोटबंदी असफल नहीं थी. उसके चार उद्देश्य थे.
1. यूपी चुनाव से पहले विरोधी दलों का पैसा खराब कर देना, क्योंकि बीजेपी के पास तो पैसों की कमी थी नहीं. नोटबंदी का मकसद था चुनाव को एक असमान मुकाबला बना देना. बीजेपी को पहले से पता था. वह ढेर सारा भुगतान एडवांस कर चुकी थी. उसके पास नए नोट भी बेशुमार थे. चुनाव में उसके 32 हेलीकॉप्टर उड़े. सभी विरोधी दलों के पास मिलाकर 5 थे. जिस दिन आखिरी चरण का मतदान खत्म हुआ, उसके अगले दिन बैंक से रुपए निकालने की लिमिट खत्म कर दी गई. नोटबंदी का काम पूरा हुआ.

2. सारा काला धन सफेद करके सिस्टम के अंदर लाना.कालाबाजारियों की मदद करना.

3. छोटे बिजनेसमैन को तबाह कर बड़े कारोबारियों को लाभ पहुंचाना, क्योंकि कैशलेश काम करने की तैयारी सिर्फ बड़े कारोबारियों को थी. नरेंद्र मोदी को बड़े कारोबारियों ने पीएम बनाया था. वह कर्जा मोदी ने चुका दिया.

4. चीन की कंपनी अलीबाबा के बच्चे PayTM को बिजनेस देना.

चारो मकसद पूरे हुए।
इससे क्या फर्क पड़ता है कि लाइन में 200 से ज्यादा लोग मर गए. अर्थव्यवस्था तबाह हो गई. लाखों मजदूरों के हाथों से काम छिन गया. छोटे व्यापारी बर्बाद हो गए।

Thursday, November 2, 2017

मानहानि के खिलाफ अधिकार

मानहानि क्या है ?

भारतीय दंड संहिता की धारा 499 के अनुसार-किसी के बारे में बुरी बातें बोलना, लोगों को अपमानजनक पत्र भेजना, किसी की प्रतिष्ठा गिराने वाली अफवाह फैलाना, अपमानजनक टिप्पणी प्रकाशित या प्रसारित करना। पति या पत्नी को छोड़कर किसी भी व्यक्ति से किसी और के बारे में कोई अपमानजनक बात कहना, अफवाह फैलाना या अपमानजनक टिप्पणी प्रकाशित करना मानहानि माना जा सकता है।
मानहानि की कार्यवाही का समय-
परिसीमा अधिनियम 1963: इस अधिनियम के अनुसार व्यक्ति को एक साल के भीतर मानहानि के लिए कानूनी कार्यवाही करनी होगी।
मानहानि के प्रकार
मानहानि दो प्रकार से हो सकती है-
मौखिक रूप में, जिसमे कोई व्यक्ति या संस्था किसी व्यक्ति विशेष को निशाना बनाकर आधारहीन आलोचना कर सकती है,
प्रकाशन रूप में, भी किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ उसकी छवि खराब करने के उद्देश्य से अगर कुछ छापा जाता है, जिसको पढ़कर या मौखिक रूप से की गयी टिप्पणी को सुनकर लोगो के मन में किसी व्यक्ति विशेष के लिए घृणा का भाव उत्पन्न होता हो तो यह मानहानि की श्रेणी में आता है |
मृत व्यक्ति को कोई ऐसा लांछन लगाना जो उस व्यक्ति के जीवित रहने पर उसकी ख्याति को नुकसान पहुंचाता । और उसके परिवार या निकट संबंधियों की भावनाओं को चोट पहुंचाता ।
किसी कंपनी , संगठन या व्यक्तियों के समूह के बारे में भी ऊपर लिखित बात लागू होती है ।
किसी व्यक्ति पर  व्यंग्य के रुप में कही गयी बातें।
मानहानिकारक बात को छापना या बेचना।

साइबर मानहानि कानून-
सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000 की धारा 66-ए-
कोई भी व्यक्ति जो कंप्यूटर या संचार उपकरण के माध्यम से कोई ऐसे जानकारी भेजता है जो अपमानजनक हो या जिससे व्यक्ति को किसी प्रकार का भी नुक्सान पहुंचे।
जो जानकारी गलत हो पर उसे भेजने वाला असुविधा, अपमान, रुकावट, घृणा, धमकाने इत्यादि के उदेश्य्य से किसी कंप्यूटर या संचार उपकरण के द्वारा ऐसे जानकारी लगातार भेजता रहे।
इलेक्ट्रॉनिक मेल के द्वारा व्यक्ति को गुमराह करना और मेल की उत्पत्ति के बारे में कोई भी जानकारी न देना।
उपयुक्त परिस्थितियों में व्यक्ति को 3 साल तक का कारावास और जुर्माना भी हो सकता है।
साइबर मानहानि मुख्तय: दो भागों में बांटी जा सकती है-
पहली श्रेणी में वो व्यक्ति ज़िम्मेदार होगा जिसने मानहानिकारक जानकारी प्रकशित की है।
दूसरी श्रेणी में इन्टरनेट सर्विस प्रोवाइडर को ज़िम्मेदार माना जायेगा जिससे मानाहिकारक जानकारी का प्रकाशन हुआ है।

सच्ची टिप्पणी मानहानि नहीं

किसी व्यक्ति के बारे में अगर सच्ची टिप्पणी की गयी हो और वह सार्वजनिक हित में किसी लोक सेवक के सार्वजनिक आचरण के बारे में हो अथवा उसके या दूसरों के हित में अच्छे इरादे से की गयी हो अथवा लोगों की भलाई को ध्यान में रखते हुए उन्हें आगाह करने के लिए हो , तो इसे मानहानि नहीं माना जायेगा।
सच्ची टिप्पणी(बयान) के निम्न बिंदु हैं: बयान केवल आलोचनात्मक हो, तथ्य न हो, बयान सार्वजनिक हित के लिए हो, बयान निष्पक्ष और ईमानदार हो।
मानहानि के लिए कार्यवाही
मानहानि के लिए दो तरह की कार्यवाहियाँ की जा सकती हैं-
पहला, अपराधिक मुकदमा चला कर मानहानि करने वाले व्यक्तियों और उस में शामिल होने वाले व्यक्तियों को न्यायालय से दंडित करवाया जा सकता है।
दूसरा, यदि मानहानि से किसी व्यक्ति की या उस के व्यवसाय की या दोनों की कोई वास्तविक हानि हुई है तो वह उस का हर्जाना प्राप्त करने के लिए दीवानी दावा न्यायालय में प्रस्तुत कर सकता है और हर्जाना प्राप्त कर सकता है। 
अपराधिक मामले में जहाँ नाममात्र का न्यायालय शुल्क देना होता है, वहीं हर्जाने के दावे में जितना हर्जाना मांगा गया है उस के पाँच से साढ़े सात प्रतिशत के लगभग न्यायालय शुल्क देना पडता है, जिसकी दर अलग अलग राज्यों में अलग अलग है।
मानहानि करने वाले के खिलाफ मुकदमा-
मानहानि के इन अपराधों के लिए धारा 500, 501 व 502 में दो वर्ष तक की कैद की सजा का प्रावधान किया गया है। लोक शांति को भंग कराने को उकसाने के आशय से किसी को साशय अपमानित करने के लिए इतनी ही सजा का प्रावधान धारा 504 में किया गया है।
मानहानि करने वाले के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने के लिए दस्तावेजों के साथ सक्षम क्षेत्राधिकारी के न्यायालय में लिखित शिकायत करनी होगी।
न्यायालय शिकायत पेश करने वाले का बयान दर्ज करेगा, अगर आवश्यकता हुई तो उसके एक-दो साथियों के भी बयान दर्ज करेगा।
इन बयानों के आधार पर यदि न्यायालय समझता है कि मुकदमा दर्ज करने का पर्याप्त आधार उपलब्ध है तो वह मुकदमा दर्ज कर अभियुक्तों को न्यायालय में उपस्थित होने के लिए समन जारी करेगा।
आपराधिक मामले में जहां नाममात्र का न्यायालय शुल्क देना होता है । वहीं हर्जाने के दावे में जितना हर्जाना मांगा गया है , उसके 5 से 7.50 फीसदी के लगभग न्यायालय शुल्क देना पड़ता है । जिसकी दर अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग है।
मानहानि के मामले में वादी को केवल यह सिद्ध करना होता है कि टिप्पणी अपमानजनक थी और सार्वजनिक रुप से की गयी थी । उस यह सिद्ध करने की जरुरत नहीं है कि टिप्पणी झूठी थी।
बचाव पक्ष को ही यह साबित करना होता है कि वादी के खिलाफ उसने जो टिप्पणी की थी, वह सही थी ।
अभियुक्त के उपस्थित होने पर उससे आरोप बता कर पूछा जाएगा कि वह आरोप स्वीकार करता है अथवा नहीं। आरोप स्वीकार कर लेने पर उस मुकदमे का निर्णय कर दिया जाएगा।
यदि अभियुक्तों द्वारा आरोप स्वीकार नहीं किया जाता है तो शिकायतकर्ता और उसके साक्षियों के बयान पुनः अभियुक्तों के सामने लिए जाएंगे, जिसमें अभियुक्तों या उनके वकील को साक्षियों से प्रतिपरीक्षण करने का अधिकार होगा। साक्ष्य समाप्त होने के उपरांत अभियुक्तों के बयान लिए जाएंगे।
यदि अभियुक्त बचाव में अपना बयान कराना चाहते हैं तो न्यायालय से अनुमति ले कर अपने बयान दर्ज करा सकते हैं। वे अपने किन्ही साक्षियों के बयान भी दर्ज करवा सकते हैं। इस तरह आई साक्ष्य के आधार पर दोनों पक्षों के तर्क सुन कर न्यायालय द्वारा निर्णय कर दिया जाएगा।
अपराधिक मामले में अभियुक्तों को दोषमुक्त किया जा सकता है या उन्हें सजा और जुर्माने से दंडित किया जा सकता है। शिकायतकर्ता को अभियुक्तों से न्यायालय का खर्च दिलाया जा सकता है। लेकिन इस मामले में कोई हर्जाना शिकायतकर्ता को नहीं दिलाया जा सकता।
मानहानि से हुई हानि की क्षतिपूर्ति-
यदि कोई व्यक्ति अपनी मानहानि से हुई हानि की क्षतिपूर्ति प्राप्त करना चाहता है तो उसे, सबसे पहले उन लोगों को जिनसे वह क्षतिपूर्ति चाहता है, एक नोटिस देना चाहिए कि वह उनसे मानहानि से हुई क्षति के लिए कितनी राशि क्षतिपूर्ति के रूप में चाहता है। नोटिस की अवधि व्यततीत हो जाने पर वह मांगी गई क्षतिपूर्ति की राशि के अनुरूप न्यायालय शुल्क के साथ सक्षम क्षेत्राधिकार के न्यायालय में वाद दस्तावेजी साक्ष्य के साथ प्रस्तुत कर सकता है।
वाद प्रस्तुत करने पर संक्षिप्त जाँच के बाद वाद को दर्ज कर न्यायालय समन जारी कर प्रतिवादियों को बुलाएगा और प्रतिवादियों को वाद का उत्तर प्रस्तुत करने को कहेगा। उत्तर प्रस्तुत हो जाने के उपरांत यह निर्धारण किया जाएगा कि वाद और प्रतिवाद में तथ्य और विधि के कौन से विवादित बिंदु हैं और किस बिन्दु को किस पक्षकार को साबित करना है।
प्रत्येक पक्षकार को उस के द्वारा साबित किए जाने वाले बिन्दु पर साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान किया जाएगा। अंत में दोनों पक्षों के तर्क सुन कर निर्णय कर दिया जाएगा।
यहाँ पर्याप्त साक्ष्य न होने पर दावा खारिज भी किया जा सकता है और पर्याप्त साक्ष्य होने पर मंजूर किया जा कर हर्जाना और उस के साथ न्यायालय का खर्च भी दिलाया जा सकता है।
दुर्भावनापूर्ण अभियोजन से बचाव
अगर किसी निर्दोष व्यक्ति को अभियुक्त को बना दिया जाय और वह सिद्ध कर सके कि उसे बदनाम या ब्लैकमेल करने जैसे बुरे इरादे से उसके खिलाफ अभियोग लगाया गया था तो वह अदालत में मामला दर्ज कर अभियोग लगाने वाले से मुआवजा मांग सकता है । यह दावा मानसिक तथा मानसिक दोनों प्रकार की चोट की भरपाई के लिए हो सकता है।
अगर किसी व्यक्ति को बुरे इरादे से सिविल मुकदमें में फंसाया जाय तो वह मामला दर्ज कर मुआवजे की मांग कर सकता है।



Friday, October 27, 2017

'दलितों के लिए देश नहीं, ख़ुद लड़ना होगा उन्हें'

क्या जातीय हिंसा और भेदभाव से देश और इसे भुगतने वाले दलित, दोनों एक बराबर प्रभावित होते हैं?

क्या देश के सभी नागरिकों के साथ एक समान व्यवहार करने के मामले में भारत 70 सालों में कुछ बेहतर हो पाया है या फिर हालात पहले जैसे ही हैं?

तर्क-वितर्क करने वाले बुद्धिजीवियों के लिए राष्ट्र अपने-आप में एक मिथक हो सकता है और यह आम लोगों की धारणा भी हो सकती है.

यह एक वर्गीकृत संरचना से बिल्कुल कम नहीं है और ऊपरी तौर पर यह एक छद्म निष्पक्ष तस्वीर पेश करती है.

इसलिए किसी ख़ास परिस्थिति में इसकी कार्रवाई पूर्वाग्रह से ग्रसित हो सकती है.

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ऊना की घटना

वाकई में दलित ऐसा ही महूसस करते हैं इसलिए ऊना की घटना देश की चेतना को नहीं बदल सकती. बदलावों के लिए दलितों और उनके दर्द से जुड़ाव होना जरूरी होता है.

जाति व्यवस्था ख़त्म करने पर राजनीतिक इच्छाशक्ति और उत्साह का अभाव दिखता है क्योंकि कथित ऊंची जातियों की कई पीढ़ियों ने इस व्यवस्था से फ़ायदा उठाया है.

दलित अगर बराबर के नागरिक बन गए तो उन्हें क्या फ़ायदा होगा? गुजरात के ऊना में गाय मारने के आरोप में कथित गोरक्षकों ने दलितों की घंटों पिटाई की थी.

इस घटना को एक साल पूरे हो चुके है. उस वक्त ऊना की घटना के बाद बहस के लिए बुलाई गए संसद के विशेष सत्र में बड़े पैमाने पर सीटें खाली रह गई थीं.

ये तब था जब मौजूदा एनडीए के पास यूपीए की तुलना में अधिक सांसद हैं और दलितों की बात संसद में रखने के लिए दलित ख़ुद वहां मौजूद हैं.

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भारत में छुआछूत

ये सभी दलित सांसद ये बताने में गर्व जताते रहे कि उनकी सरकार ने इस घटना के बाद पीड़ितों को कितनी मेडिकल सहायता और अन्य तरह की मदद मुहैया कराईं.

यूपीए के समय में दलितों पर ज़्यादा जघन्य अपराध हुए, इस बात को साबित करने के लिए उनके पास अपने ही सबूत हैं.

दुख की बात तो है कि कोई ये सवाल नहीं पूछता कि अभी तक भारत में छुआछूत इतने बड़े पैमाने पर क्यों हैं?

ऊना के बाद हर कोई गोरक्षकों के अवैध तरीकों के बारे में बात कर रहा था. प्रधानमंत्री ने भी अपने पीड़ा भरे शब्द अगले दिन व्यक्त किए.

उन्हें पता था कि गाय की राजनीति उन्हें ज़्यादा से ज़्यादा वोट दिला सकती है.

बीजेपी की राज्य सरकार इसके बाद ऐसे कड़े कानून ले आई जिससे गायों की सुरक्षा कम और गोरक्षकों की सुरक्षा ज़्यादा हो.

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असल तस्वीर

ऊना की घटना ने हर किसी को परेशान किया क्योंकि सबने टीवी और मोबाइल फोन पर दलितों के साथ होने वाली क्रूरता देखी.

लेकिन गैर सरकारी संगठन नवसर्जन ट्रस्ट के साल 2010 के सर्वे में एक भयावह तस्वीर सामने लाई है. यह उसी गुजरात की तस्वीर है जहां ऊना की घटना हुई है.

अगर सवाल उठता है गुजरात ही क्यों? तो इसलिए क्योंकि इसे एक मॉडल स्टेट की तरह पेश किया गया है.

गांवों में रहने वाले 90.2 फ़ीसदी दलित हिंदू होते हुए भी मंदिरों में प्रवेश नहीं कर सकते. 64 फ़ीसदी पंचायत अपने निर्वाचित दलित सदस्यों के साथ भेदभाव करते हैं.

54 फ़ीसदी राजकीय प्राथमिक विद्यालयों में दलित बच्चों के लिए मिडडे मिल के वक्त अलग से लाइन लगाई जाती है.

रोहित वेमुला की मौत के बाद प्रदर्शनइमेज कॉपीरइटPTI

राजनीतिक परिदृश्य

यह 1569 गावों और 98,000 लोगों की प्रतिक्रियाओं के आधार पर तैयार की गई रिपोर्ट कुछ ठोस तथ्य हैं.

नवसर्जन ट्रस्ट को सौराष्ट्र के इलाके में उन 1500 से ज्यादा बच्चों के बारे में पता चला जिन्हें उनके शिक्षक, स्कूल के शौचालय साफ करने के लिए अलग से छांट कर रखे थे.

ये मेहतर (साफ-सफाई करने वाले) के बच्चे थे. ये कुछ ऐसी सच्चाई हैं जो हमें टीवी या मोबाइल स्क्रीन पर नहीं दिखती है लेकिन होती हर रोज़ हैं.

हालांकि ऊना की घटना ने राजनीतिक परिदृश्य में बहुत असर डाला है.

दलितों के बीच साल 1980 में गुजरात के गांवों में काम करते हुए मैंने पाया था कि दलितों को मतदान केंद्र तक अमूमन नहीं पहुंचने दिया जाता था.

दलितइमेज कॉपीरइटAFP

ऊना के बाद राजनीति

मुझे वहां दलितों के ऊपर शारीरिक हिंसा के साथ उनकी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं भी देखने को मिली.

और ऐसा सिर्फ़ इसलिए क्योंकि वो ऊंची जातियों के वोट नहीं डालने के फरमान को नहीं मानने की हिम्मत करते थे.

यह अभी भी आनंद ज़िले के धर्माज जैसे गांवों में ऐसा ही होता है.

यह गांव प्रभावशाली गैर प्रवासी भारतीयों और बैंक में सौ करोड़ से अधिक राशि जमा करने के लिए जाना जाता है.

ऊना और सहारनपुर की घटना के बाद राजनीतिक दल इस बात को लेकर चिंतित हैं कि जो दलित वोट बैंक पहले उप जातियों में विभाजित था, वो अब दलित पहचान के नाम पर एकजुट हो जाएगा.

एनडीए की छवि को नुक़सान

सभी राजनीतिक दल यह बात बखूबी समझते हैं कि दलित भले ही 'अछूत' हो सकते हैं, लेकिन उनके वोट तो काम के हैं.

16.6 फ़ीसदी दलित वोट के बिना कोई भी राजनीतिक दल बहुमत नहीं पा सकता है.

इसलिए एनडीए ने पहली बार बौद्ध भिक्षुओं को दलितों को समझाने-बुझाने के काम पर लगाया है. ऊना की घटना के बाद एनडीए की छवि को नुक़सान पहुंचा है.

गुजरात में दलितों की आबादी महज 7.01 फ़ीसदी है. वो अकेले अपने दम पर किसी भी बड़े दल की किस्मत बदलने की स्थिति में नहीं है.

लेकिन सत्तारूढ़ बीजेपी गुजरात को लेकर आशंकित है क्योंकि यह कभी उसकी प्रयोगशाला रही है. हाल में ग़ैर-दलित वोट में बिखराव देखा गया है.

संविधान से अधिक...

हिंदू राष्ट्र का विचार लोगों की भावनाओं को छूने में कामयाब होता नहीं दिख रहा.

जाट, पटेल और मराठा जैसी जो कथित ऊंची जातियां हैं, वो अपने आरक्षण को लेकर अधिक जागरूक दिख रहे हैं न कि हिंदू राष्ट्र के नाम पर बलि का बकरा बनने को लेकर.

प्रभावशाली जातियों में भी जो गरीब लोग हैं, उन्हें इस बात का एहसास है कि ऊंची जाति की पहचान भी उनकी आर्थिक स्थिति नहीं सुधार पाई है. यह राजनीति है.

दलित जो कि अपमान झेल रहे हैं, वो सरकार कौन बना रहा है इससे अधिक इस बात को लेकर फिक्रमंद है कि जाति और भेदभाव ख़त्म हो.

छुआछूत मुक्त समाज?

क्या भारत साल 2047 तक, जब वो अपनी आज़ादी के सौ साल पूरे होने का जश्न मना रहा होगा, तब क्या छूआछूत मुक्त समाज बन पाएगा?

दलितों के उभार को ऐतिहासिक तौर पर हमेशा नुकसान पहुंचाया जाता रहा है. इसी सिलसिले में कभी-कभी ऊना जैसी घटना के बाद गुस्सा भी फूट पड़ता है.

यह द्वंद्व बना हुआ है कि उन्हें अपमान सहते हुए भी बहुसंख्यकों से जुड़कर रहना होगा या फिर राजनीति से अलग हो र बराबरी के लिए सामाजिक संघर्ष करना बेहतर होगा?

इतिहास की दीवारों पर यह बहुत साफ-साफ लिखा हुआ है. अमरीका के अफ्रीकी मूल के लोगों का संघर्ष का अनुभव भी सामने हैं.

सिर्फ़ सामाजिक संघर्ष ही बराबरी और सम्मान दे सकता है. दलितों को अपने अधिकारों की लड़ाई ख़ुद लड़नी पड़ेगी. यह लड़ाई पूरा देश नहीं लड़ने वाला.