Thursday, February 22, 2018

बढ़ते जन असन्तोष से तिलमिलाये भगवाधारी


विकास का मुखौटा धूल में, नफ़रत से सराबोर ख़ूनी चेहरा सबके सामने -

जैसे-जैसे केन्द्र की राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन की सरकार अपना कार्यकाल पूरा होने की ओर बढ़ रही है, वैसे-वैसे अगले लोकसभा चुनाव में किसी अनहोनी के होने की आशंका से भारतीय जनता पार्टी और उसके भगवाधारी कुटुम्ब की नींद हराम होती जा रही है। गुजरात विधानसभा चुनाव और राजस्थान उपचुनाव में पार्टी के ख़राब प्रदर्शन के मद्देनज़र उसके वैचारिक धर्मगुरुओं को भविष्य के ग्रह-नक्षत्र अच्छे नहीं दिखायी दे रहे हैं। यही वजह है कि समूचा भगवा कुटुम्ब अगले साल मतदान की फ़सल काटने के लिए ख़ून की बारिश करवाने में एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा रहा है। अर्थव्यवस्था में छायी मन्दी और बढ़ती बेरोज़गारी के काले बादल दिन-ब-दिन घने होते जा रहे हैं और भगवाधारियों के दरबारी अर्थशास्त्री भी एक साल के भीतर उम्मीद की कोई किरण नहीं देख पा रहे हैं। यही वजह है‍ कि सट्टा बाज़ार के कारोबारी सूचकांक में भले ही गिरावट देखने को मिल रही हो, लेकिन नफ़रत के कारोबारी सूचकांक में ज़बरदस्त उछाल देखने में आ रहा है। अल्पसंख्यकों, दलितों और महिलाओं के ख़िलाफ़ विषवमन की अपनी गौरवशाली (कु)संस्कृति के नित-नये नमूने पेश हो रहे हैं। अन्धराष्ट्रवाद की दुकान भी ख़ूब चल रही है। पाकिस्तान और कश्मीर फिर से सुर्खियों में लौट आये हैं। नये साल की शुरुआती दिनों में ही संघ परिवार की वानर सेना के उपद्रवी उन्माद से आने वाले दिनों में उनकी आक्रामकता बढ़ने के संकेत स्पष्ट दिखायी दे रहे हैं।

अच्छे दिन लाने और हर साल 2 करोड़ नौकरियाँ पैदा करने के जुमलेबाजी भरे वायदे करके प्रधानमन्त्री की कुर्सी पर पहुँचे नरेन्द्र मोदी अब अपने फिसड्डीपन का ठीकरा कांग्रेस की पिछली सरकारों पर मढ़कर लोगों का गुस्सा कांग्रेस की ओर मोड़ने की हास्यास्पद कोशिशें कर रहे हैं। प्रति वर्ष 2 करोड़ नौकरियाँ तो दूर मोदी सरकार पिछले 5 सालों से ख़ाली पड़े लगभग 5 लाख पदों को ख़त्म करने की क़वायद में लगी है। वर्तमान सरकार के पौने चार साल के कार्यकाल में लगभग 5 लाख नयी नौकरियाँ ही जोड़ी गयी हैं। नयी नौकरियाँ पैदा करना तो दूर इस सरकार के कार्यकाल में रोज़गार सृजन की दर लगातार गिरती गयी है। कुल नौकरियों की संख्या भी साल-दर-साल कम होती जा रही है। वर्ष 2014 में मैन्युफ़ैक्चरिंग क्षेत्र में कुल 48 करोड़ नौकरियाँ थीं जो 2016 में गिरकर 46.7 करोड़ रह गयीं। बेशर्मी की हद तो तब हो गयी जब देश का प्रधानमन्त्री पकौड़े बेचने को भी रोज़गार का सृजन बताने लगा और सत्तारूढ़ पार्टी का अध्यक्ष इस शर्मनाक बयान के पक्ष में संसद में कठदलीली करता नज़र आया।

टि्वटर पर एकतरफ़़ा संवाद करने में माहिर प्रधानमन्त्री को पौने चार साल में एक प्रेस काॅन्फ्रेंस के ज़रिये जनता से मुख़ातिब होने तक का साहस नहीं हुआ। कुछ दरबारी पत्रकारों को इण्टरव्यू देकर अपने फिसड्डीपन पर पर्दा डालने की हास्यास्पद कोशिश करके नरेन्द्र मोदी ने अपनी छीछालेदर ही करवायी। संसद में अपनी सरकार की हर मोर्चे पर विफलता को ढँकने के लिए कांग्रेस और नेहरू तक को दोषी ठहराने की घिसी-पिटी क़वायद से लोग अब ऊबते जा रहे हैं। जहाँ एक ओर आम जनता की ज़ि‍न्दगी की मुश्किलें  बढ़ती जा रही हैं, वहीं दूसरी ओर धनपतियों की सम्पत्ति में इज़ाफ़ा होने की रफ़्तार भी दिन-दूनी रात-चौगुनी बढ़ती जा रही है। आर्थिक असमानता की खाई के चौड़ा होने पर साम्राज्यवादी थिंकटैंक भी जमकर घड़ि‍याली आँसू बहा रहे हैं। ऑक्सफ़ैम की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक़ वर्ष 2017 में देश में उत्पादित कुल सम्पदा का 73 प्रतिशत हिस्सा शीर्ष के 1 प्रतिशत धनपशुओं के हिस्से में चला गया। अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन की एक हालिया रिपोर्ट यह आशंका जता रही है कि 2019 तक देश की सक्रिय कार्यशील आबादी का 77 प्रतिशत असुरक्षित रोज़गार की श्रेणी में आ जायेगा। ग़ौरतलब है कि इस रिपोर्ट में बेरोज़गारों और तथाकथित स्वरोज़गार में लगी करोड़ों की आबादी नहीं शामिल है। इसके अतिरिक्त अर्थव्यवस्था में पसरी मन्दी के काले बादल छँटने की सम्भावना दूर-दूर तक नहीं दिखायी दे रही है। विकास की गर्जना अब शान्त हो चुकी है और साम्प्रदायिक विद्वेष व अन्धराष्ट्रवाद का उन्मादी शोरगुल देश-भर में फैल रहा है।

जहाँ एक ओर नरेन्द्र मोदी विकास की दहाड़ पर लगाम लगाकर अपने फिसड्डीपन का ठीकरा अतीत की सरकारों पर मढ़ने में मशगूल हैं, वहीं दूसरी ओर उनके संघी कुटुम्ब के उपद्रवी बिरादर सड़कों पर आतंक से लेकर टीवी स्टूडियो और सोशल मीडिया, व्हाट्सऐप जैसे माध्यमों से अल्पसंख्यकों, दलितों और स्त्रियों के विरुद्ध निकृष्टतम स्तर के घृणि‍त विचारों का विषवमन करते दिख रहे हैं। आतंक और नफ़रत के इस माहौल की गवाही ख़ुद गृह मन्त्रालय के आँकड़े ही दे रहे हैं। लोकसभा में एक प्रश्न का उत्तर देते हुए गृह राज्य मन्त्री हंसराज अहिर ने बताया कि अकेले वर्ष 2017 में देश में कुल 822 साम्प्रदायिक वारदातें हुईं जिनमें 111 लोग मारे गये और 2384 लोग ज़ख़्मी हुए। वर्ष 2016 में साम्प्रदायिक हिंसा की 703 घटनाएँ घटी थीं जिनमें 86 लोग मारे गये थे और 2321 लोग घायल हुए थे जबकि 2015 में साम्प्रदायिक वारदातों की संख्या 751 थी, जिनमें 97 लोग मारे गये और 2264 लोग घायल हुए थे। वर्ष 2017 में उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक 195 साम्प्रदायिक वारदातें हुईं जिनमें 44 लोग मारे गये और 542 लोग घायल हुए। उत्तर प्रदेश इस समय योगी ब्राण्ड हिन्दुत्व की प्रयोगशाला बना हुआ है। इस प्रयोगशाला में इस साल का पहला प्रयोग हिन्दुत्ववादी उपद्रवियों ने कासगंज में गणतन्त्र दिवस पर अपने चिर-परिचित अन्दाज़ में तिरंगा यात्रा की आड़ में मुस्लिम आबादी को उकसाने की घिनौनी क़रतूत के रूप में किया जिससे उपजी साम्प्रदायिक हिंसा में चन्दन गुप्ता नामक एक शख़्स की मौत हो गयी जिसके बाद पूरे क़स्बे में मुसलमानों की दुकानों और घरों को चुन-चुनकर जलाया गया। संघी दंगाइयों को अच्छी तरह से पता है कि उनकी उकसावेबाजी से इस्लामिक कट्टरपन्थी ताक़तों की मज़हबी ठेकेदारी भी चल निकलती है जिसका लाभ अन्तत: हिन्दुत्ववादियों को ही होता है। कासगंज के अलावा इसका एक नमूना दिल्ली के रघुबीर नगर में अंकित सक्सेना नामक युवक की ‘ऑनर किलिंग’ के रूप में सामने आया जिसकी मुस्लिम प्रेमिका के परिजनों ने निर्मम हत्या कर दी। हिन्दू और मुस्लिम दोनों धर्मों के कट्टरपन्थी ठेकेदार ऊपरी तौर पर एक-दूसरे के ख़ि‍लाफ़ कितनी भी गर्मागर्म बातें करें, असलियत तो यह है कि वे एक-दूसरे के पूरक हैं। एक की राजनीति चमकती है तो दूसरे की भी बाँछें खिल जाती हैं क्योंकि उसको भी राजनीतिक रोटियाँ सेंकने के लिए आग मिल जाती है।

सड़कों पर आतंक के अतिरिक्त भगवा फ़ासिस्टों के प्रवक्ताओं ने टीवी स्टूडियो में ज़हरीले बयान देकर देश के साम्प्रदायिक परिवेश को प्रदूषित करने की घिनौनी रणनीति के अमल में तेज़ी ला दी है। राकेश सिन्हा, विनय कटियार, ज्ञानदेव आहूजा जैसे संघी बड़बोलों ने हाल के दिनों में अल्पसंख्यकों के ख़ि‍लाफ़ खुली धमकी भरे ज़हरीले बयान दिये हैं जिनका मक़सद समाज में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण में तेज़ी लाना है ताकि रोज़ी-रोटी के ज्वलन्त मुद्दे दब जायें। इसके अलावा राम मन्दिर की आग को एक बार फिर भड़काने के लिए संघ परिवार के अनुषंगिक संगठन एक रामराज्य रथ यात्रा चला रहे हैं जो साम्प्रदायिक धुँआ छोड़ती हुई 6 राज्यों से होकर गुज़रेगी। साम्प्रदायिक नफ़रत के अलावा जातिगत तनाव बढ़ने के संकेत भी साफ़ नज़र आ रहे हैं जिसका नतीजा भीमा कोरेगाँव की घटना और हाल ही में इलाहाबाद में एक दलित युवक की बर्बर हत्या के रूप में सामने आया। पद्मावत फ़िल्म पर प्रतिबन्ध लगाने के पीछे की राजनीति भी जातिगत दरारों को चौड़ा करने की घृणित कोशिशों का ही विस्तार थी। निक्करधारियों द्वारा महिलाओं के ख़ि‍लाफ़ विषवमन और वैलेण्टाइन्स डे के विरोध के नाम पर प्रेम की आज़ादी पर हमले को भी समाज में दक़ि‍यानूसी मानसिकता को बढ़ावा देकर अपने वोटबैंक को सुदृढ़ करने की कोशिशों की निरन्तरता में ही देखा जाना चाहिए।

पूरे समाज को साम्प्रदायिक नफ़रत की आग में झोंकने के अतिरिक्त फ़ासिस्टों की दूसरी रणनीति अन्धराष्ट्रवाद की हवा चलाने की है। पाकिस्तान और कश्मीर के मसले इन दोनों रणनीतियों के बीच सेतु का काम करते हैं। हाल ही में दक्षिण कश्मीर के शोपियाँ में आर्मी जवानों की फ़ायरिंग में तीन नागरिकों की मौत को जायज़ ठहराने और गढ़वाल राइफ़ल्स के मेजर आदित्य कुमार पर की गयी एफ़आईआर को रद्द करवाने के लिए एक मुहिम चलायी गयी। मामले को सर्वोच्च न्यायालय ले जाया गया। सर्वोच्च न्यायालय ने भी भारतीय राज्य के प्रति पक्षधरता दिखाते हुए एफ़आईआर पर स्टे लगा दिया। इसके अलावा हाल में जम्मू और कश्मीर में सीआरपीएफ़ कैम्पों पर हुए आतंकी हमलों के लिए रोहिंग्या मुसलमानों को जि़म्मेदार ठहराते हुए संघ परिवार के लग्गू-भग्गुओं ने रोहिंग्या मुसलमानों को भारत से खदेड़ने के लिए शुरू की गयी मुहिम तेज़ कर दी है। हाल में जम्मू में सुजवान स्थित आर्मी कैम्प पर हमले के बाद भाजपा नेता कविन्दर गुप्ता के नेतृत्व में निक्करधारियों ने जम्मू में रोहिंग्या मुसलमानों के शरणार्थी शिविरों के आसपास तनाव का माहौल बनाया जिससे संघ परिवार की रणनीति की झलक मिलती है।

उपरोक्त घटनाक्रमों से स्पष्ट है कि कर्नाटक, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में आगामी विधानसभा चुनावों में अपना जनाधार सुदृढ़ करने और आगामी लोकसभा चुनावों से पहले वर्तमान सरकार के ख़ि‍लाफ़ बढ़ते जन असन्तोष की दिशा मोड़ने के लिए हिन्दुत्ववादी फ़ासिस्ट किसी भी हद तक गुज़र सकते हैं। सत्ता हाथ से खोने के भय से वे और भी अधिक आक्रामक मुद्रा में आकर किसी बड़े षड्यन्त्र को अंजाम देने से भी नहीं चूकेंगे। ऐसे में उनकी घिनौनी साज़ि‍शों का पर्दाफ़ाश करना पहले से कहीं ज़्यादा ज़रूरी हो जाता है। लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। साम्प्रदायिक नफ़रत और अन्धराष्ट्रवाद की आग में देश को झोंकने की हिन्दुत्ववादी साज़ि‍शों को रचनात्मक तरीक़े से जनता के सामने उजागर करने के अलावा आज सकारात्मक तौर पर रोज़गार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी जीवन की बुनियादी ज़रूरतों के आधार पर आन्दोलन संगठित करने की सख़्त ज़रूरत है। इस प्रक्रिया में जनता वर्तमान पूँजीवादी ढाँचे के सीमान्तों को भी समझ सकेगी और इस ढाँचे को आमूलचूल तौर पर बदलकर बराबरी, आज़ादी और इंसाफ़ पर आधारित नये सामाजिक ढाँचे की नींव तैयार करने की प्रक्रिया भी तेज़ होगी। यानी फ़ासीवाद-विरोधी आन्दोलन को चुनावी गठबन्धन तक सीमित करने की बजाय उसे पूँजीवाद-विरोधी व्यापक आन्दोलन से जोड़ना बेहद ज़रूरी है।
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राफेल विमान घोटाला

​हथियारों का जनद्रोही कारोबार और राफ़ेल विमान घोटाला​

लॉकहीड मार्टिन, बोईंग, रेथीओन, बीएई सिस्टम, नार्थरोप ग्रुमैन। हो सकता है कि आपमें से बहुत से लोगों ने ये नाम पहले कभी न सुने हों। ​ये नाम आज के समय में दुनिया की 5 सबसे बड़ी हथियार बनाने वाली कम्पनियों के हैं। इन 5 में से 4 कम्पनियाँ अमेरिका की हैं।​ इनमें से बीएई सिस्टम एक ब्रिटिश कम्पनी है। दुनिया भर में लगातार फैलते हुए हथियारों के बाज़ार का 60% हिस्सा अमेरिकी कम्पनियों के क़ब्ज़े में है। अभी हाल ही में भारत की फ़्रांस के साथ राफ़ेल विमानों की ख़रीद को लेकर बहुत हो-हल्ला मचा। जो कम्पनी राफ़ेल विमान बनाती है, उसका नाम है – दसॉल्ट एविएशन। रक्षा सौदों को लेकर पहले भी बहुत से मामले उठाये जाते रहे हैं। आगस्टा वेस्टलैण्ड का मामला अभी भी बहुत पुराना नहीं हुआ है। ​आज़ादी आने के बाद से ही कभी जीप घोटाले से लेकर बोफ़ोर्स घोटाले तक… अगर गिना जाये तो देशहित में किये गये इन घोटालों की एक लम्बी फ़ेहरिस्त है। ‘राष्ट्रवादी’ भाजपा ने भी पिछली बार सत्ता में आने पर ही ताबूत घोटाला करके अपने देशभक्त होने का सबूत पेश कर दिया था।​ ऐसे में राफ़ेल विमान की ख़रीद में घोटाले का मामला कोई आश्चर्य की बात नहीं है।

लेकिन सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि राफ़ेल के बाद मचे इस शोर-शराबे के पीछे की कहानी क्या है? यूपीए सरकार के समय में फ़्रांसीसी कम्पनी दसाल्ट ने सबसे कम क़ीमत की बोली लगाकर यूरोफ़ाइटर को हराकर भारत को लड़ाकू विमान सप्लाई करने का अधिकार हासिल किया था। 2012 से ही विमान के ख़रीद की प्रक्रिया की शुरुआत कर दी गयी थी। उस दौरान भारत सरकार और दसाल्ट एविएशन के बीच यह समझौता हुआ था कि 530 करोड़ रुपये प्रति विमान की दर से भारत सरकार दसाल्ट से 18 लड़ाकू विमान ख़रीदेगी और 108 विमानों को भारत सरकार की कम्पनी हिन्दुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड तकनीक प्राप्त करके बनायेगी। बाद में फ़्रांस दौरे पर नरेन्द्र मोदी ने इस डील को रद्द करने की घोषणा की और लगभग 1600 करोड़ रुपये प्रति विमान की दर से दसाल्ट एविएशन से 36 विमान ख़रीदने का फ़ैसला लिया। ​बिज़नेस स्टैण्डर्ड ने यह अनुमान लगाया है कि तत्कालीन रक्षा मन्त्री मनोहर पर्रीकर के बयान से यह ज़ाहिर हो रहा है कि यह फ़ैसला लेने में उचित कमेटियों से राय नहीं ली गयी।​
लेकिन सोचने की बात है कि जब इस पूँजीवादी मशीनरी का हर हिस्सा मेहनतकश वर्ग के हितों के ख़िलाफ़ जाकर पूँजीपतियों की तिजोरी भरने के ही काम आता है, तो इस व्यवस्था की सेवा करने वाली इस या उस कमेटी से सलाह ले लेने से भी बस यह होता कि लूट को एक क़ानूनी जामा पहना दिया जाता। पिछली डील को रद्द करने के बाद जब नये सिरे से विमान ख़रीद की सौदेबाज़ी शुरू हुई तो इसमें और अन्य कम्पनियों को आमन्त्रित करके कम क़ीमत पर बेहतर विमान ख़रीदने की बजाय सिर्फ़ दसाल्ट के साथ ही सौदेबाज़ी कर ली गयी। इतना ही नहीं, भारत सरकार की कम्पनी हिन्दुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड इस नयी डील से ग़ायब हो चुकी है। जबकि इस डील के पीछे का एक मक़सद हिन्दुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड को तकनीक हस्तान्तरित करके इस क्षेत्र में आत्म निर्भर बनना भी था।

इस फ़ैसले के पीछे मोदी सरकार का यह तर्क है कि विमानों को अपग्रेड किया गया है। लेकिन असल बात कुछ और ही है। दरअसल ​पिछली डील रद्द करने के दो हफ़्ते बाद ही दसाल्ट एविएशन और रिलायंस के बीच का एक जॉइंट वेंचर बना लिया गया जो डील करने वाली मुख्य कम्पनी है। इसके बाद दसाल्ट एविएशन ने हिन्दुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड द्वारा बनाये जाने वाले 108 विमानों की गारण्टी लेने से भी इनकार कर दिया।​ केन्द्र में बैठी भाजपा सरकार गोपनीयता का हवाला देकर इस पूरे मसले को देशहित से जोड़ रही है। समझा जा सकता है कि अपने आकाओं के हित साधने का काम किया जा रहा है और नाम दिया जा रहा है देशहित का। वास्तव में पूँजीवादी व्यवस्था में चुनावी पार्टियाँ जब भी देशहित की बात करें, तो सही मायने में वह अम्बानी, अडानी जैसे लोगों के हितों की ही बात कर रही होती हैं।

स्टाकहोम इण्टरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टिट्यूट नाम की एक संस्था के अध्ययन के मुताबिक़ आज भारत दुनिया में हथियारों का सबसे बड़ा ख़रीदार देश है। दुनिया के सबसे ज़्यादा सैन्य ख़र्च वाले देशों में भारत का स्थान पाँचवाँ है। जबकि शिक्षा पर ख़र्च के मामले में यह बांग्लादेश और नेपाल जैसे देशों से टक्कर ले रहा है। इस बार के बजट में भी पिछली बार की तरह कुल बजट का 12% हिस्सा देश की रक्षा के लिए कुर्बान किया गया है। दूसरी ओर शिक्षा के बजट को कुल बजट के 3.7% से घटाकर 3.5% कर दिया गया। आज दुनिया में हथियारों का कुल बाज़ार 375 बिलियन डॉलर का पहुँच गया है, जो कि दक्षिण अफ़्रीका जैसे देश की कुल जीडीपी से भी ज़्यादा है। दुनिया भर में सेनाओं पर एक दिन होने वाला ख़र्च लगभग 1600 बिलियन डॉलर है, जो कि भारत द्वारा एक साल में शिक्षा और चिकित्सा पर किये जाने वाले कुल ख़र्च का लगभग 75 गुना है। संयुक्त राष्ट्र के एक अनुमान के मुताबिक़ 30 बिलियन डॉलर के निवेश से दुनिया से भुखमरी का ख़ात्मा किया जा सकता है। दुनिया में इस समय लगभग 1 अरब लोग प्रतिदिन भूखे सोते हैं, जबकि भारत में यह आँकड़ा लगभग 20 करोड़ है।

​अपने इस कुकृत्य को जायज़ ठहराने के लिए ही आम जनता के दिलों में देशभक्ति की आग जलाये रखने की कोशिश में कभी चीन तो कभी पाकिस्तान का भय दिखाया जाता है। वास्तव में देश की सुरक्षा के पीछे मुट्ठी भर मुनाफ़ाखोरों के हितों की सुरक्षा छिपी होती है।​

आँकड़े बता रहे हैं ​आर्थिक संकट के इस भयंकर दौर में भी दुनिया भर में हथियार उद्योग में 2002 से 2016 के बीच 87% की वृद्धि हुई है। विश्व शान्ति और सुरक्षा के नाम पर स्थापित किये गये संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य दुनिया के सबसे ज़्यादा सैन्य ख़र्च वाले देशों में शामिल हैं।​ पूरी दुनिया की शान्ति और सुरक्षा को स्थापित करने की ज़िम्मेदारी ये किस तरह निभाते हैं, उससे हम सभी अच्छी तरह वाकिफ़ हैं। वास्तव में आज विश्वव्यापी आर्थिक संकट ने विश्व पूँजीवाद की कमर तोड़कर रख दी है। ऐसे समय में अर्थव्यवस्था को धक्का देकर कुछ और आगे खिसका देने का सबसे आज़माया तरीक़ा है – युद्ध के ज़रिये हथियारों की बिक्री। राफ़ेल विमानों के सौदे से पहले दसाल्ट एविएशन की हालत भी बहुत ख़राब थी। आर्थिक संकट से निज़ात पाने के लिए आज विश्व की एक बड़ी आबादी को युद्ध की त्रासदी झेलने के लिए धकेल दिया गया है। साम्राज्यवादी ताक़तों ने पूरे मध्य पूर्व को अपना चारागाह बना रखा है, जहाँ से वह एक तरफ़ तेल निचोड़ लेती है, तो दूसरी ओर युद्ध में झोंककर हथियार की बिक्री से अपने चक्के को कुछ देर के लिए और गतिशील कर देती है। इसके सबूत विभिन्न संस्थाओं द्वारा पेश किये गये ताज़ा आँकड़े हैं जो यह बता रहे हैं कि पिछले पाँच सालों में हथियारों का व्यापार शीतयुद्ध के बाद से सर्वाधिक है। इस माँग की सबसे बड़ी वज़ह पश्चिम एशिया और एशिया के देशों में हथियार की माँग का बढ़ना है। अकेले सऊदी अरब के हथियार की ख़रीद में पिछले 5 वर्षों में 212% की वृद्धि हो गयी, जो कि सैन्य ख़र्च के मामले में भारत से ऊपर चौथे स्थान पर है। विश्व शान्ति के ठेकेदार और लोकतन्त्र के सबसे बड़े चौधरी अमेरिका द्वारा ख़तरनाक हथियार रखने का आरोप लगाकर दूसरे देशों पर हमला कर देना, जगह-जगह सीमा विवाद भड़काकर, आतंकवाद का नाम लेकर युद्ध की आग लगाने जैसे काम आम हैं। संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद के यही स्थायी सदस्य दुनिया में सबसे ज़्यादा परमाणु हथियार रखने वाले देश भी हैं। दुनिया के कुल परमाणु हथियारों का 93% केवल दो देशों अमेरिका और रूस के पास है।

ऐसे समय में एक बात तो तय है कि यह स्थिति ऐसे ही नहीं बनी रहेगी और आने वाले समय में दो ही विकल्प बचेंगे। साम्राज्यवादी दुनिया हथियारों की अन्धी होड़ में या तो पूरी इंसानियत को विनाश के गड्ढे में धकेल जाने दिया जाये या फिर लूट और शोषण पर टिकी इस व्यवस्था को जड़ से उखाड़ फेंकने और एक समाजवादी समाज के निर्माण के लिए लड़ाई लड़ी जाये।
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Saturday, January 13, 2018

विश्वविद्यालयों में शिक्षक पदों पर आरक्षण का दायरा अत्यन्त सीमित करने का यूजीसी का प्रस्ताव

उच्च शिक्षा-संस्थानों में शिक्षकों की नियुक्ति के नियमों में एक बड़ा परिवर्तन करने का प्रस्ताव, यूजीसी ने मानव संसाधन मंत्रालय को भेजा है। यदि इस प्रस्ताव को मंत्रालय की स्वीकृति मिल जाती है, तो विश्वविद्यालयों और उससे संबंद्ध कॉलेजों में एससी-एसटी और ओबीसी के लिए आरक्षित होने वाले फैकल्टी पदों में भारी कमी हो जायेगी। यूजीसी का प्रस्ताव यह है कि विश्वविद्यालयों में आरक्षण लागू करते समय पूरे विश्वविद्यालय को इकाई मानने की जगह अलग-अलग विषयों के विभाग को इकाई माना जाय। अभी तक केंद्रीय विश्वविद्यालयों में पूरे विश्वविद्यालय को एक इकाई मानकर आरक्षण लागू किया जाता था।


यूजीसी के इस प्रस्ताव को यूजीसी से अनुदान प्राप्त 41  केंद्रीय विश्वविद्यालयों में रिक्त पड़े 5 हजार 997 पदों पर होने वाली नियुक्तियों से जोड़ कर देखा जा रहा है। ये पद कुल पदों के 35 प्रतिशत हैं, जिनमें जल्दी नियुक्तियां होने वाली हैं। यदि विश्वविद्यालयों को इकाई मानने का नियम जारी रहता है तो कम-से-कम 3 हजार के आसपास पदों पर एससी-एसटी और ओबीसी समुदायों सेे आने वाले शिक्षकों को नियुक्त करना बाध्यता होती। यदि विभाग को इकाई मानने का यूजीसी का नया प्रस्ताव लागू होता है, तो इन समुदायों के नहीं के बराबर शिक्षक नियुक्त होंगे। शिक्षा जगत, समाज और विशेष तौर पर बुहजन पर इसका कितना गंभीर और दूरगामी असर पड़ेगा, इसकी आसानी से कल्पना की जा सकती है। इन लगभग 6 हजार पदों में 2 हजार 457 पद असिस्टेंट प्रोफेसर, 2 हजार 217 एसोसिएट प्रोफेसर और 1 हजार 98 पद प्रोफेसर के हैं।

यदि विभागों को इकाई मानकर आरक्षण लागू किया जाता है, इसका क्या असर पडेगा, इस संदर्भ में भारत सरकार में पूर्व सचिव और इस मामले के विशेषज्ञ पी.एस. कृष्णनन ने ‘दी इंडियन एक्सप्रेस’ से बात करते हुए कहा कि इसके चलते इन संस्थानों में एसस-एसटी और ओबीसी की शिक्षकों की संख्या अत्यन्त कम हो जायेगी। ज्ञातव्य है कि वैसे भी उच्च शैक्षणिक संस्थाओं में आरक्षित समुदायों के शिक्षकों की संख्या अत्यन्त कम है, खासकर प्रोफेसर और एसोसिएट प्रोफेसर (रीडर) के पदों पर। इस संदर्भ में दीनदयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय, गोरखपुर  में हिंदी विभाग के प्रोफेसर कमलेश गु्प्त आंकडों का हवाला देकर बताते  हैं कि उच्च शैक्षणिक संस्थाओं में एसोसिएट प्रोफेसर, प्रोफेसर और कुलपति के रूप में एससी-एसटी और ओबीसी समुदाय के लोगों की संख्या अत्यन्त सीमित है।


यूजीसी द्वारा प्रस्तावित इस नई प्रक्रिया को सत्यवती कॉलेज के एसोसिएट प्रोफेसर रविंद्र गोयल चोर दरवाजे से आरक्षण को खत्म करने की प्रक्रिया मानते हैं। उनका कहना है कि सरकारों की यह हिम्मत तो नहीं है कि वे संवैधानिक तौर पर आरक्षण को खत्म कर सके, इसलिए वे ऐसे तरीके निकाल रही हैं जिससे आरक्षण व्यवहारिक तौर पर खत्म हो जाय या अत्यन्त नगण्य हो जाय। दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षक नेता और एकेडमिक काउंसिल के चुने सदस्य शशिशेखर सिंह कहते हैं कि असल में यदि यूजीसी का यह प्रस्ताव लागू हो जाता है तो, विभिन्न विश्वविद्यालयों में बहुत सारे ऐसे विभाग होंगे, जहां एक पद भी आरक्षित श्रेणी के लिए नहीं होगा।

दीनदयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय के मध्यकालीन और आधुनिक इतिहास विभाग के प्रोफेसर चन्द्रभूषण गु्प्ता इसे आज के राजनीतिक हालातों से जोड़ते हैं। उनका कहना है कि पिछलों वर्षों में, खासकर 2014 के बाद राजनीति में उच्च-जातीय मानसिकता के संगठनों और व्यक्तियों का प्रभाव काफी बढ़ गया, वे आरक्षण को कभी सीधी चुनौती देते हैं तो कभी पिछले दरवाजे से आरक्षण को खत्म करने की कोशिश करते हैं। यूजीसी का यह प्रस्ताव इसी की एक कड़ी है। उच्च-शिक्षा संस्थाओं से दलित, आदिवासी और पिछड़े समुदाय के शिक्षकों को बाहर करने का उद्देश्य इन ज्ञान-विज्ञान के बौद्धिक केंद्रों पर उच्च-जातियों के पूर्ण वर्चस्व का रास्ता फिर से खोलना है।

अपने इस नए प्रस्ताव का आधार यूजीसी ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस निर्णय को बनाया है, जिसमें न्यायालय ने कहा है कि आरक्षण की इकाई समग्र विश्वविद्यालय नहीं, बल्कि विभाग होना चाहिए। न्यायालय के इस निर्णय को आज की राजनीति से जोड़ते हुए उत्तर प्रदेश एससी-एसटी और अन्य पिछड़़ा वर्ग आरक्षण संघर्ष समिति के संयोजक दुर्गा प्रसाद यादव कहते हैं कि आरक्षित वर्गों का संघर्ष कमजोर पड़ा है, उच्च जातियों का चौतरफा वर्चस्व बढ़ा है, इसमें न्यायालय भी शामिल है। वे इलाहाबाद उच्च न्यायालय के इस निर्णय का एससी-एसटी और ओबीसी पर पड़ने वाले प्रभाव के उदाहरण के रूप में हाल में स्थापित सिद्धार्थ विश्वविद्यालय को लेते हैं। वे बताते हैं कि इस विश्वविद्यालय में विभागों को इकाई मानकर असिस्टेंट प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर के कुल 84 पद विज्ञापित किये गये, 

Tuesday, January 9, 2018

दलित गौरव की बात सवर्ण हिंदुओं के लिए तकलीफ़देह क्यों ?


भारत संतरे की तरह रहा है, ऊपर से एक, भीतर अनेक फाँकें.

'अनेकता में एकता', 'फूल हैं अनेक किंतु माला फिर एक है', 'विविधता ही हमारी शक्ति है'...ऐसे नारे उन अक्लमंद लोगों ने गढ़े थे जो चाहते थे कि संतरा एक रहे, वे जानते थे कि भारत में सदियों से तरह-तरह के लोग बिना झगड़े साथ रहते आए हैं.

वे जानते थे कि ये एक मामूली संतरा नहीं है, इसकी सारी फाँकें अलग-अलग तो हैं ही, अलग-अलग आकार-प्रकार की भी हैं, उनके दुख-सुख और चाहत-नफ़रत एक नहीं हैं. कोई फाँक रस से भरी, कोई सूखी और कोई बहुत बड़ी, तो कोई बहुत छोटी है.

उनके सामने चुनौती थी आज़ाद भारत में तमाम विरोधाभासों के बावजूद एक नई शुरुआत करने की. उन्हें पता था कि इतिहास को पीछे जाकर ठीक नहीं किया जा सकता.

उनका इरादा देश को 'रिवर्स गियर' में चलाने का या इतिहास को बैकडेट से अपने जातीय-नस्ली-सांप्रदायिक स्वाभिमान के हिसाब से दोबारा लिखने का नहीं, बल्कि तरक्क़ी की इबारत लिखने का था.

बिना इंसाफ़ के अमन कब, कहां हुआ?

उन्होंने ग़ैर-बराबरी और पीढ़ी-दर-पीढ़ी शोषण को ईश्वरीय न्याय मानने वाले समाज में 'एक वोट, समान अधिकार, सबकी सरकार' जैसा क्रांतिकारी विचार रखा, वो भी ऐसे दौर में जब इस्लाम के नाम पर पाकिस्तान बन चुका था और भारत में संविधान की जगह मनुस्मृति को क़ानून बनाने की माँग उठ रही थी.

मगर इसके बाद जो 'लेकिन' आता है, वो बहुत बड़ा लेकिन है, भारत की एकता की बात तो अच्छी है 'लेकिन' बिना इंसाफ़ के अमन कब हुआ है, कहाँ हुआ है?

मुसलमानों ने अपना देश ले लिया तो हिंदुओं को भी अपना एक देश मिलना चाहिए जिसे वे क़ानून से नहीं, धर्म से चला सकें, उनकी नज़र में यह वो इंसाफ़ था, जो नहीं हो पाया. इस्लामी पाकिस्तान जैसा बना सब देख रहे हैं, हिंदू भारत का विज़न उससे कोई अलग नहीं है.

आंबेडकर मानते थे कि अगर हिंदू भारत बना तो वह दलितों के लिए अंगरेज़ी राज के मुक़ाबले कहीं अधिक क्रूर होगा, उन्होंने बीसियों बार इस आशंका के प्रति आगाह किया है.

पैदाइश की बुनियाद पर होने वाले अपमान-अन्याय-अत्याचार को धर्म और संस्कृति मानना, उन्हें सामान्य नियम बताकर उनका पालन करना, और पालन न करने वालों को 'दंडित' करना, ये सब संविधान और क़ानूनों के बावजूद आज भी सनातन चलन में है.

संघ का हिंदुत्व और दलित चुनौती

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हमेशा से हिंदू एकता का हिमायती रहा है, वह जातियों में बँटे हिंदुओं को एकीकृत राजनीतिक शक्ति बनाना चाहता है ताकि वैसा हिंदू राष्ट्र बन सके जो उनकी सबल, स्वाभिमानी और गौरवशाली राष्ट्र की कल्पना है.

संघ को दलितों का भी साथ चाहिए लेकिन वह हिंदू धर्म के वर्णाश्रम विधान के ख़िलाफ़ क़तई नहीं है, संघ से जुड़े अनेक शीर्ष 'विद्वानों' और नेताओं ने जाति पर आधारित व्यवस्थित अन्याय के लिए कभी अँगरेज़ों को, कभी मुसलमानों को ज़िम्मेदार बताया, लेकिन सामाजिक न्याय की ज़िम्मेदारी ख़ुद कभी स्वीकार नहीं की, बल्कि उनकी कोशिश जाति पर आधारित चिरंतन अन्याय को ही झुठलाने की रही.

भारत में सामाजिक अध्ययन की शीर्ष संस्था आइसीएसएसआर के प्रमुख बीबी कुमार मानते हैं कि सूअर खाने वाले लोगों को मुग़लों के अत्याचार ने दलित बना दिया वर्ना उसके पहले सभी बराबरी से मिल-जुल कर रहते थे, वे ये भी कहते हैं कि मनुस्मृति को अंगरेज़ों ने बिगाड़ दिया.

उना में दलितों की पिटाई, रोहित वेमुला की आत्महत्याकुछ ऐसे हालिया मामले हैं जिन पर संघ ने मौन को बेहतर माना या फिर इन घटनाओं का प्रतिकार करने वालों पर जातिवादी होने का ठप्पा लगाया.

रोहित दलित था या नहीं, इसमें मामले को उलझाना आसान था, लेकिन दलितों के साथ संस्थागत स्तर पर अन्याय होता आया है, और अब भी हो रहा है, ये मानना उनके लिए संभव नहीं है.

जातिवादी की आम परिभाषा ये है--जो व्यक्ति जाति के आधार पर ख़ुद को श्रेष्ठ और दूसरों को हीन समझे वह जातिवादी है.

दलित कब से ख़ुद को श्रेष्ठ समझने लगे कि वे जातिवादी हो गए? जाति के आधार पर होने वाले अन्याय का प्रतिकार अगर जातिवाद है तो न्याय की गुंजाइश कहाँ है?

बहरहाल, सामाजिक न्याय की बात करने वाले सभी लोग संघ और भाजपा की नज़रों में जातिवादी रहे, जिन लोगों ने सामाजिक न्याय की राजनीतिक हिमायत की (लालू, मुलायम, मायावती वगैरह) उनकी करनी और बदनामी मूल मुद्दे को ही झटक देने के काम आई.

अमित शाह की दलितों के घर खाना खाने की रस्म-अदायगी, लेकिन जब सहारनपुर में राजपूतों से टकराव हो तो दलित नेता चंद्रशेखर पर राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून लगाकर लंबे समय से जेल में रखना, दूसरी ओर नंगी तलवारें लेकर राणा प्रताप जयंती जुलूस के नाम पर हिंसा करने वालों के ख़िलाफ़ वैसी ही कार्रवाई न करना, उसी सनातन चलन का हिस्सा है.
क्या राष्ट्रनिर्माताओं और संघ दोनों की ग़लती एक जैसी?

इंसाफ़ के बिना अमन मुमकिन नहीं, तो क्या आंबेडकर-नेहरू-पटेल जैसे राष्ट्रनिर्माताओं ने दलितों पर हुए अत्याचार का हिसाब दुरुस्त किये बग़ैर सबके लिए समान अधिकार की व्यवस्था कर दी जो चलने वाली चीज़ नहीं थी क्योंकि अन्याय बरक़रार था.

ऐसा नहीं है, इसे समझते हुए सदियों के शोषण और ग़ैर-बराबरी को आगे के लिए ठीक करने की नीयत से संविधान में आरक्षण की व्यवस्था की गई ताकि दलित और पिछड़े देश की कहानी के अगले अध्याय में किरदार अदा कर सकें.

'ईश्वरीय व्यवस्था' के मुक़ाबले यही एक मानवीय व्यवस्था है जो काफ़ी हद तक कारगर रही है.

लेकिन उसी आरक्षण व्यवस्था को ख़त्म करने की बात संघ और बीजेपी के अंदर से अक्सर उठती रही है, बिहार चुनाव से पहले मोहन भागवत ने ऐसा ही बयान दिया था, हालांकि चुनावी हिसाब लगाने के बाद नरेंद्र मोदी को कहना पड़ा था कि "मैं जान देकर भी आरक्षण की रक्षा करूँगा."

कुछ ही दिनों पहले भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री सीपी ठाकुर ने कहा कि अब देश का राष्ट्रपति एक दलित व्यक्ति है, प्रधानमंत्री ख़ुद पिछड़े तबके से आते हैं इसलिए आरक्षण समाप्त कर दिया जाना चाहिए, यानी सदियों चले आ रहे जातीय शोषण, जो अब भी जारी है, उसका हिसाब बराबर मान लिया जाए.

भाजपा के केंद्रीय मंत्री अनंत हेगड़े कह चुके हैं कि उनकी पार्टी सत्ता में संविधान को बदलने के लिए आई है हालाँकि संसद में हंगामे के बाद मामले को रफ़ा-दफ़ा कर दिया गया लेकिन देश के समतामूलक संविधान पर संघ की आपत्तियाँ अनगिनत मौक़ों पर दर्ज हुई हैं.
संघ का प्रिय नारा 'समरसता' का है, यानी देश के सभी लोग हिंदुत्व के रंग में रंग जाएँ, लेकिन जातीय श्रेष्ठता के भाव से पैदा हुए शोषण को ख़त्म किए बिना समरसता कैसे हो सकती है?

संघ का दावा है कि उसके यहाँ जातिभेद जैसी कोई चीज़ नहीं है, लेकिन उसके 92 साल के इतिहास में सिर्फ़ एक ग़ैर-ब्राह्मण सरसंघचालक हुआ है, जो उत्तर प्रदेश के एक राजपूत राजेंद्र सिंह उर्फ़ रज्जू भैया थे.

इस तथ्य का ज़िक्र करना जातिवादी मानसिकता से प्रेरित बताया जाता है लेकिन ऐसा करना जातिवाद नहीं है.

स्वाभिमान केवल सवर्ण ही खोजें, दूसरे नहीं?

झाँसी की रानी को नहीं, बल्कि पद्मावती को 'राष्ट्रमाता'भाजपा के एक राजपूत मुख्यमंत्री ने घोषित किया, तलवार भांजने वाले करणी सेना के राजपूतों को संघ और भाजपा का भरपूर साथ मिला.

गुजरात के गौरव का नारा ख़ुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लगाया मानो गुजरात में पैदा हुए सारे लोग महान हैं और बाक़ी उनसे कमतर.

मेक इन इंडिया, विकास, स्किल्ड इंडिया, स्मार्ट सिटी जैसे नारों के हवा होने के बाद, भारत के जिस वैदिक-सांस्कृतिक-ऐतिहासिक गौरव की पुनर्स्थापना इस सरकार के एजेंडा में सबसे ऊपर है उसमें ब्राह्मणों और राजपूतों के अलावा किसकी चर्चा है?
इस पर ग़ौर करिए, लेकिन ग़ौर करते ही आपजातिवादी घोषित कर दिए जाएँगे.

ये ज़रूर है कि वक़्त-ज़रूरत के हिसाब से अलग-अलग स्तर पर कभी पटेल, कभी दिनकर, कभी आंबेडकर, कभी बिरसा मुंडा, कभी कोई और याद तो किया जाता है लेकिन वो राष्ट्रीय नहीं, स्थानीय और तात्कालिक एजेंडा रहा है.

जब पूरे देश में विकास, न्याय, समता, शिक्षा और स्वास्थ्य के बदले जातीय-सांप्रदायिक-क्षेत्रीय गौरव की राजनीति हो रही हो तो दलितों को क्यों रोका जाना चाहिए? 'आत्मसम्मान' दूसरों के लिए मूँछ का सवालहै, जबकि वह दलितों की वास्तविक ज़रूरत है.

कोरेगाँव भीमा की लड़ाई में 200 साल पहले ब्राह्मण-मराठा सेना को हराने की याद दलितों के दिल में गौरव पैदा करती है तो उन्हें ऐसा महसूस करने से देश का कौन-सा क़ानून रोक सकता है? उनके ख़िलाफ़ सत्ता की शक्ति का प्रयोग समरसता के नारे को और खोखला ही करेगा.

जो ख़ुद को राष्ट्रनायक समझते हैं, उनके चलाए फ़ैशन पर दूसरे अमल करें तो उन्हें खुशी का इज़हार करना चाहिए न कि पुलिस और मुकदमों का सहारा लेना चाहिए.